पाली जिले का मेघवाल समाज अपने आर्थिक पिछड़ेपन के लिए आए दिन दूसरों को कोसता रहता हैं लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हमारी अशिक्षा, गरीबी व दरिद्रता के लिए काफी हद तक हम खुद ही जिम्मेदार हैं कोई और नहीं.
मेघवाल समाज ने कुरीतियों से मानो गहरा रिश्ता बना दिया है, गहना बना दिया है. विडंबना यह है कि सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों को बढावा देने में हमारे कथित पढ़े-लिखे लोग ज्यादा आगे है. जिन्हें अंधविश्वास का अंधेरा मिटा कर ज्ञान का उजियारा फैलाना था वे समाज को रसातल में धकेलने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं.
हमारे समाज के ही राजनेता अपने स्वार्थ के खातिर इन कुरीतियों को रोकने की बजाय बढ़ावा देते हैं. इन दिनों पाली जिले में गांव-गांव में लोकदेवता रामदेवजी के मंदिर बनाने के बाद मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के खर्चीले आयोजन हो रहे हैं. इस वैज्ञानिक युग में पत्थरों में प्राण डालने के मूखर्तापूर्ण आयोजन हो रहे हैं. कबीर, रैदास, सिद्ध पुरुष बाबा रामदेव और बाबासाहेब ने बर्बादी के इन अंधविश्वासों से बाहर निकालने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया लेकिन हम ऐसी बातों से बाज नहीं आ रहे हैं और जग-हंसाई करवा रहे हैं.
गरीब लोग गहने- जमीन बेचकर ,कर्ज लेकर मंदिर बनवाते है, उस पर सोने का शिखर बनवाते है. स्कूल छुड़वा कर बच्चियों से रूपये लेकर गंगाजल से कलश भरवाते है. फिर कई दिन तक अव्यवस्थाओं का जीमण करवाते हैं, लोग बीमार होते हैं. बात यहीं तक नहीं रूकती है. टोगड़ा टोगड़ी (बछड़े बछड़ी) की शादी के बिना इनका आयोजन अधूरा रहता है. बाकायदा बारात, फेरे,गीत, जीमण सब कुछ होता है.
समाज में शिक्षा, रोजगार की कमी, ऊपर से नशे की लत के कारण कुंवारे युवाओं की फौज खड़ी है लेकिन मेघवालों को गोमाता की संतानों की शादी की चिंता ज्यादा है. आखिर हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं? भावी पीढ़ियों को क्या विरासत में देकर जा रहे हैं?
इसी क्षेत्र की खेती पशुपालन करने वाली मारवाड़ की ओबीसी जातियां अपने हुनर से दक्षिण भारत में बिजनेस की राह अपनाकर आर्थिक तरक्की की ओर आगे बढी हैं जबकि हमने अपनी सामाजिक आर्थिक बर्बादी की कंटीली बाड़ खुद ही बना ली है. बीपीएल, नरेगा, मुफ्त की चीनी चावल , राशन कार्ड के आगे हम सोचते ही नहीं है.
यदि आप पढ़े लिखे हैं और पे बैक टू सोसाइटी के तहत समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करते हैं तो साहब! चुप मत रहिए, समाज को जाग्रत करने के लिए बोले, कुछ लिखे, अनपढ भोले गरीबों को समझाएं. हमारे चुप रहने से समाज बर्बाद हो जाएगा.
अधिक लोगों की खुशहाली के लिए कुछ रूढिवादी लोगों की नाराजगी की चिंता नहीं करें. हमारी चुप्पी व सजन्नता समाज को ले डूबेगी. हमारी शिक्षा की सार्थकता इसी में है कि हम समाज में बदलाव लाएं. हम बदल सकते हैं, हममें वो क्षमता है, बस उस शक्ति को सृजनात्मक दिशा में उपयोग में लाने की जरूरत है. समाज में खुशियां बांटों, दुख नहीं.
सबका कल्याण हो… सभी प्राणी सुखी हो!
(लेखक: एम एल परिहार, यह उनके निजी विचार है)

