काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व के साथ उपस्थित. आचार्य नागार्जुन के मध्यमक दर्शन में काल को उसी श्रेणी में रखा गया है, जिस श्रेणी में आत्मा, पदार्थ और सत्ता की अन्य स्थायी कल्पनाएँ आती हैं. अर्थात काल भी एक प्रत्यय है, मन द्वारा निर्मित एक अवधारणा.

हम सामान्यतः भूत, वर्तमान और भविष्य को वास्तविक मान लेते हैं. भूत स्मृति है, भविष्य कल्पना और वर्तमान क्षण भर का अनुभव। किंतु नागार्जुन के अनुसार यदि भूत वास्तव में होता तो वह नष्ट क्यों होता. यदि भविष्य पहले से होता तो वह भविष्य क्यों कहलाता. और यदि वर्तमान स्थायी होता तो वह प्रवाह में क्यों बदलता. इस प्रकार तीनों कालखंड तर्क की कसौटी पर टिक नहीं पाते.

मूलमाध्यमककारिका में नागार्जुन स्पष्ट करते हैं कि जो वस्तु परस्पर निर्भर उत्पन्न होती है, उसका स्वभावतः स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता। काल भी घटनाओं पर आश्रित है, घटनाएँ काल पर नहीं. बिना परिवर्तन के काल की कोई अनुभूति नहीं और बिना मन के उस अनुभूति का कोई आधार नहीं. इसलिए काल स्वयं में सत्य नहीं, बल्कि सापेक्ष अनुभव है.

यहाँ सत्य उस अर्थ में नहीं है जिसे हम स्थूल यथार्थ समझते हैं. नागार्जुन का सत्य द्वि-स्तरीय है: संवृति सत्य और परमार्थ सत्य। काल, इतिहास, क्रम, कारण–कार्य सब संवृति सत्य के अंतर्गत आते हैं. व्यवहार के लिए उपयोगी, किंतु अंतिम नहीं. परमार्थ सत्य में न काल है, न अकाल. वहाँ केवल प्रतीत्यसमुत्पाद है, जो स्वयं शून्य है.

मन जब प्रवाह को पकड़ने का प्रयास करता है, तो वह उसे खंडों में बाँट देता है. इन्हीं खंडों को हम भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं. यह विभाजन वस्तु का नहीं, दृष्टि का है. इसलिए काल वस्तु नहीं, दृष्टिकोण है। जैसे नदी बहती है, पर हम उसे कल, आज और कल के जल में बाँट देते हैं. नदी नहीं बँटती, हमारी कल्पना बँटती है.

नागार्जुन का काल-विचार हमें यह सिखाता है कि दुख का मूल भी इसी काल-बोध में छिपा है. भूत की स्मृतियाँ और भविष्य की आशंकाएँ वर्तमान को ग्रस लेती हैं. जब मन काल की इस रचना से मुक्त होता है, तब वह क्षण में स्थित होता है, न भूत में बंधा, न भविष्य में उलझा.

अतः काल कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि मन की बनाई हुई एक सुविधा है. वह व्यवहार के लिए आवश्यक हो सकता है, पर सत्य नहीं. सत्य न तो भूत है, न वर्तमान और न भविष्य. सत्य इन तीनों की सीमाओं से परे, शून्यता के उस बोध में है जहाँ न आने का भय है और न जाने का शोक.

यही नागार्जुन का काल-दर्शन है – न काल का निषेध, न उसका स्वीकार, बल्कि उसकी शून्यता का साक्षात्कार.

(लेखक: डॉ विकास सिंह)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

बहुजन अस्मिता: प्रतीकों से वैचारिक क्रांति तक

भारतीय समाज के सांस्कृतिक और वैचारिक धरातल पर वर्तमान में जो मंथन चल रहा है, वह केवल प्रतीकों के बदलाव का विषय नहीं है,...

ब्राह्मणवाद की टीम ‘ए’-कांग्रेस और टीम ‘बी’-भाजपा : मान्यवर श्री कांशीराम साहब का नागपुर संदेश

मान्यवर साहेब, बहुजन समाज की मुक्ति के अद्वितीय योद्धा, सामाजिक परिवर्तन के प्रखर प्रचारक और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक, जिन्होंने अपनी समूची...

बहुजन की ज्वलंत ज्योति: बहनजी का ओज, बसपा का अटल वैभव

जब जगतगुरु संत शिरोमणि गुरु रैदास की जयंती पर गुरु बाबा रैदास की प्रतिमा/चित्र के सम्मुख समाजवादी पार्टी, श्री अखिलेश यादव और इनके उद्दंड...

बहुजन मिशन के योद्धा की अनिवार्य त्रिवेणी: W = T₁ × T₂ × T₃

मिशन (बहुजन समाज पार्टी) के सच्चे कार्यकर्ता की पहचान एक सरल किंतु गहन सूत्र में निहित है—W = T₁ × T₂ × T₃। यह...

चमचा वर्ग: बहुजन आंदोलन का सबसे खतरनाक दुश्मन

बहुजन आंदोलन की राह हमेशा काँटों भरी रही है। कोई भी बड़ा सृजनात्मक और सकारात्मक बदलाव, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या राजनैतिक,...

आर्थिक आत्मनिर्भरता: बहुजन आंदोलन की ताकत

बहुजन समाज पार्टी के मिशन में एक छोटी-सी बात बार-बार दोहराई जाती है, लेकिन उसका गहरा अर्थ बहुत कम लोग समझ पाते हैं। जो...

प्रश्नों की हत्या और ईश्वर का भ्रम

मानव-मन की सबसे गहन जिज्ञासा वह नहीं है जो तारों की दूरी मापती है, न ही वह जो समुद्र की गहराई को छूने की...

मान्यवर साहेब की अमर त्रयी: बहुजन समाज, बसपा और बहनजी

मान्यवर श्री कांशीराम साहेब भारतीय राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में एक ऐसे दार्शनिक के रूप में उभरे, जिन्होंने दबे-कुचले वर्गों को सशक्त...

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’: बहन मायावती जी का दर्शन

भारतीय राजनीति और समाज सुधार के इतिहास में कुछेक व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिन्होंने न केवल अपने ऐतिहासिक कार्यों एवं विचारों से समाज को...

बसपा की असली जीत—शोषितों का जगा मनोबल है

भारतीय राजनीति के विशाल मंच पर जहाँ पार्टियाँ सत्ता की चकाचौंध में रंग-बिरंगे नृत्य करती दिखती हैं, वहाँ कांग्रेस का वंशानुगत विरासतवाद, भाजपा का...

पराये धन के सहारे नहीं, बहुजन के सहारे चलती है बसपा – बहनजी का अटल स्वाभिमान

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसके संस्थापक-मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी तथा बहनजी द्वारा स्थापित बहुजन आंदोलन की मूल विचारधारा (आम्बेडकरवाद) आत्मनिर्भरता, मान-सम्मान, स्वाभिमान...

कौन सी BAMCEF? मान्यवर साहेब की असली – या ब्राह्मणवादी वित्त पोषित नकली?

आज बहुजन संगठनों की महामारी में, जब बहुजन समाज के कानों में 'बामसेफ' का नाम गूँजता है, तो हृदय में एक अनिवार्य प्रश्न उदित...