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Saturday, February 7, 2026

Bhima Koregaon: भीमा कोरेगांव की लढ़ाई क्या है और हमें उसे क्यों याद रखना चाहिए?

...देखा जाए तो भीमा कोरेगांव की लडाई (Battle of Koregaon Bhima) ब्राम्हण और बहुजनो के बीच की थी. बहुजन राजाओं के एक मोर्चा बनने में ब्राम्हण रुकावट पैदा करते थे.

Battle of Bhima Koregaon: भारत के इतिहास में बहूत सारी लडाईया हुई, लेकिन भीमा कोरेगांव की लडाई भारतीय सामाजिक न्याय के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण है. बात उस समय की है जब अशोक द्वारा प्रस्थापित अखंड भारत अनेक खंडित राष्ट्रों में विखंडित हुआ था, मुसलमानी आक्रमण के बाद एक समय भारत एक छत के नीचे फिर से आया. फिर भारत एक बार अंतर्गत संघर्षों में डूब गया. शिवाजी महाराज ने अनेक जातियों को साथ में लाके भारत को फिर से एक छत के नीचे लाने का प्रयास किया. आगे चल कर भारत में मराठा साम्राज्य फैल गया, बाद में वह भी विखंडित हो गया. जब अंग्रेज भारत में आये, तब भारत में सत्ता संघर्ष चरम सीमा पर था.

मराठा साम्राज्य पर पेशवे हावी हो चुके थे, और मराठा राजे अलग-अलग संस्थानों में राज करते हुए विभाजित थे, जैसे बडोदा, ग्वालियर, झांसी, इन्दोर, नागपुर, सतारा, कोल्हापुर, और पूणे. अंग्रेज एक-एक कर सभी संस्थानों को अपने अधिपत्य में ला रहे थे. शिवाजी महाराज के वंशज तो पूरी तरह राजनैतिक शक्ती से दूर थे. पूणे पर पेशवा बाजीराव हावी था. मराठा साम्राज्य जो जातीपाती के खिलाफ था और सही मायने में बहुजन समाज का राज्य था, वह ब्राम्हण पेशवा को रास नहीं आ रहा था. यहा तक की शिवाजीं महाराज को छत्रपती मानने के लिए वह तैयार नहीं थे, और वह महाराज को शूद्र समझते थे.

मराठा साम्राज्य विभाजित होने से, पेशवा ब्राम्हण इस का लाभ उठाते हुए बाकी मराठा संस्थानों को एक साथ नहीं आने देते थे. प्रतापसिंह भोसले सतारा की गद्दी संभालते थे, और अंग्रेजों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा निकालने के लिए उन्होंने सभी मराठा संस्थानिक राजाओं को साथ में लाने का एलान किया. लेकिन पूना का पेशवा अंग्रेजों के साथ मिलकर इस मोर्चे को तोडने के लिए तत्पर था. अंग्रेज या ब्राम्हण, इस विकल्प के सामने, प्रतापसिंह भोसले अंग्रेजो के साथ हो कर ब्राम्हण पेशवा के खिलाफ खड़े हुए. पूने में ब्राम्हण पेशवाओ ने मनुस्मृति का राज लाकर, जातीपाती का चलन जारी किया था. नागवंशीय महार जो बौद्धधर्म को मानते थे, उनकी अवस्था पेशवे काल में बहुत बूरी कर दी गई थी.

इस परिपेक्ष में देखा जाए तो भीमा कोरेगांव की लडाई (Battle of Koregaon Bhima) ब्राम्हण और बहुजनो के बीच की थी. बहुजन राजाओं के एक मोर्चा बनने में ब्राम्हण रुकावट पैदा करते थे. भीमा कोरेगांव के युद्ध के बाद पेशवाई याने मनु का शासन खत्म हो गया और पुऩः प्रतापसिंह भोसले का संस्थान बलशाली हो गया. जब प्रताप भोसले ने खुद को छत्रपति बनने की बात की तो ब्राम्हणों ने इस का विरोध किया.

सभी जानते है की 500 महार नागों ने करीब-करीब 28000 पेशवा के सैनिकों को मौत के घाट उतारा. जैसे समाज सुधारक देशमुख कहते हैं की पेशवाई खत्म होने से, 1818 के बाद बहुजन समाज में बहुत विकास हुआ. उनके लिए शिक्षा के दरवाजे खुल गये और अंग्रेजी भाषा में शिक्षा भी उन्हें प्राप्त होने लगी. जो महार नाग सैनिक थे, उनमें शिक्षा का दर 90 प्रतिशत था और महिलाएं भी पढ-लिख सकती थी. 1818- 1858, यह चालिस साल का समय एक स्वर्णिम समय था जहां इस इलाके के बहुजन समाज, विशेषकर महार समाज काफी आगे बढ गया था.

1858 के बाद महार समाज को मिलिट्री के दरवाजे बंद कर दिए गए। यहीं समय है, जहां महात्मा ज्योतिबा फुले ने आधुनिक समय में बहुजन क्रांति की शुरुआत की. अगर भीमा कोरेगांव की लडाई में ब्राम्हण पराजित नहीं होते तो बहुजन समाज का पतन होता और सामाजिक न्याय की लढ़ाई कभी पैदा ना होती.

इस प्रकार भारत के इतिहास में इस का महत्व है.

जो नया संशोधन आ रहा है, वह सिद्ध करता है की तुकाराम महाराज का मराठाधर्म ब्राम्हणधर्म के खिलाफ था. शिवाजी के एक शताब्दी पूर्व, महार समाज के लोग बौद्ध धर्म का पालन करते थे इस के सबूत आज मिलते है. यहा तक की जहां शिवाजी महाराज का जन्म हुआ वहां बौद्ध गुफाएं आज भी मौजूद हैं.

भीमा कोरेगांव का युद्ध यह सांस्कृतिक युद्ध था, इसिलिए इस का महत्व आज भी है.

(लेखक: मंगेश दहिवले; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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