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Saturday, February 7, 2026

किसी को हराना या जिताना नहीं, बल्कि ‘मजलूमों की सत्ता’ है बसपा का लक्ष्य

बसपा की स्वतन्त्र अस्मिता और मीडिया का दुराग्रह

भारत में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का उदय 1984 में मजलूमों की पुकार बनकर हुआ। अपनी स्वतन्त्र विचारधारा, रणनीति, एजेण्डा और अनवरत संघर्ष के बल पर यह दल आज राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुका है। इसने सामाजिक और राजनैतिक समीकरणों को परिवर्तित कर अपनी शर्तों पर सरकार का गठन किया और संविधान-सम्मत शासन, प्रशासन व अनुशासन की ऐसी मिसाल कायम की, जो इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अंकित है। किन्तु यह आश्चर्यजनक है कि जातिवादी सोच से ग्रस्त पत्रकार, दल, संगठन और संकीर्ण मानसिकता के लोग बसपा की इस स्वतन्त्र अस्मिता को स्वीकार करने को तैयार नहीं। ये लोग सदा से बसपा को कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के साथ जोड़कर एक भ्रामक चित्र प्रस्तुत करते रहे हैं, जिससे जनता को भ्रम का शिकार होना पड़ा है। इस भ्रान्ति का परिणाम केवल बसपा तक सीमित नहीं रहा, अपितु भोली-भाली जनता को भी भारी क्षति का सामना करना पड़ा। बिकाऊ मीडिया के इस चाल-चरित्र को पहचानते हुए बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, बल्कि व्यापार की संज्ञा दी थी (स्रोत: आंबेडकर, संकलित रचनाएँ, खण्ड 1, 1936)। इसी प्रकार, मण्डल मसीहा मान्यवर कांशीराम ने इसे माफियाओं की श्रेणी में रखकर इसके कुटिल स्वरूप को उजागर किया था (स्रोत: बहुजन संगठक, 10 मई 1990)।

वर्तमान में भारतीय राजनीति एक नवीन करवट ले रही है। उत्तर प्रदेश का मुस्लिम समुदाय एकजुट होकर बसपा की ओर रुख कर रहा है। दलित और मुस्लिम समाज मान्यवर साहेब के संदेश को स्मरण कर रहा है: “दलित-मुसलमाँ करो विचार, कब तक सहोगे अत्याचार।” इस बदलते माहौल में जहाँ एक ओर जातिवादी मीडिया ने बसपा को कमतर आँकने का दुस्साहस शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी ओर पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग भी बसपा की चर्चा और समर्थन में सक्रिय हो उठा है। धरातल पर यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। किन्तु इस नवीन वातावरण से घबराये जातिवादी दल, संगठन और उनके पिछलग्गू बिकाऊ पत्रकार—चाहे वह परम्परागत मीडिया हों या सोशल मीडिया के मंच—बसपा पर मिथ्या आरोपों की बौछार तेज कर रहे हैं। ये लोग न केवल बसपा की छवि को धूमिल करने में संलग्न हैं, बल्कि जनमानस को भटकाने का भी प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह प्रचार केवल राजनीति का खेल है, या फिर मजलूमों की स्वतन्त्र आवाज़ को दबाने की गहरी साजिश?

इस संकट के मध्य जनता को सजग रहते हुए बसपा के राजनैतिक मूलमंत्र को हृदयंगम करना होगा। बसपा का लक्ष्य किसी को हराना या जिताना नहीं, अपितु मजलूमों की सत्ता स्थापित कर उनके सम्यक् विकास, सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक सशक्तिकरण और मानवीय अधिकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। यह संकल्प बसपा की आत्मा है, जिसे मान्यवर साहेब ने अपने जीवन से सींचा और बहनजी ने अपने नेतृत्व से साकार किया। इस सोच पर आधारित एकता ही वह शक्ति है, जो दलित, आदिवासी, पिछड़े, अति-पिछड़े, अल्पसंख्यक और न्यायप्रिय अन्य लोगों को अपनी शर्तों पर सरकार बनाने का सामर्थ्य प्रदान कर सकती है। यह एकता विषमतावादी व्यवस्था के किले को ध्वस्त कर समतामूलक समाज का मार्ग प्रशस्त करेगी। किन्तु इसके लिए जनता को भ्रामक प्रचार के जाल से मुक्त होना होगा और बसपा के इस संकल्प को सुदृढ़ करना होगा।

जातिवादी मीडिया का यह दुराग्रह कोई नवीन घटना नहीं। 1984 से ही, जब बसपा ने अपनी स्थापना के साथ मजलूमों के हक़ की लड़ाई शुरू की, तब से यह सिलसिला चला आ रहा है। बसपा की हर सफलता—चाहे वह उत्तर प्रदेश में सरकार का गठन हो या राष्ट्रीय स्तर पर पहचान—को कमतर दिखाने का प्रयास किया गया। फिर भी, बसपा ने अपनी स्वतन्त्रता और संघर्ष की धारा को कभी कमजोर नहीं होने दिया। यह वह दल है, जिसने न केवल सत्ता हासिल की, बल्कि उस सत्ता का उपयोग शोषित-वंचित समाज के उत्थान के लिए किया। इसके बावजूद, बिकाऊ पत्रकार और उनके आकाओं का एकमात्र उद्देश्य बसपा को बदनाम करना और जनता को उसके मूल लक्ष्य से भटकाना रहा है। इस दुष्प्रचार का प्रभाव इतना गहरा है कि कई बार समाज का एक हिस्सा भी इस भ्रान्ति का शिकार हो जाता है। किन्तु सत्य यह है कि बसपा की ताकत उसकी जनता में निहित है, न कि मीडिया की सुर्खियों में।

आज जब उत्तर प्रदेश का सामाजिक ढाँचा नये रंग में ढल रहा है, और दलित-मुस्लिम-पिछड़ा गठजोड़ बसपा के झण्डे तले एकत्र हो रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि जनता इस बदलाव को समझे और इसके पीछे की शक्ति को पहचाने। बसपा का लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि उस सत्ता के माध्यम से एक ऐसे समाज का निर्माण है, जहाँ हर मजलूम को उसका हक़ मिले, जहाँ जाति और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। इसके लिए जनता को न केवल मिथ्या प्रचार से सावधान रहना होगा, बल्कि बसपा के सिद्धान्तों को आत्मसात् कर उसकी मजबूती के लिए कार्य करना होगा। यह संकल्प ही भारत के सच्चे लोकतन्त्र को मजलूमों की आवाज़ बनायेगा और समतामूलक समाज की नींव रखेगा। अतः यह समय है कि जनता इस दुष्प्रचार के खिलाफ एकजुट हो और बसपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने हक़ की लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाये।


स्रोत और संदर्भ :

  1. डॉ. बी.आर. आंबेडकर, “पत्रकारिता: व्यवसाय या व्यापार,” संकलित रचनाएँ, खण्ड 1, 1936।
  2. मान्यवर कांशीराम, “मीडिया का माफियाई चरित्र,” बहुजन संगठक, 10 मई 1990, अंक 5, वर्ष 8।
  3. प्रो. विवेक कुमार, “मीडिया और बहुजन राजनीति,” इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 2015।
  4. बसपा आधिकारिक बयान, “मजलूमों की सत्ता,” 2020।
  5. “उत्तर प्रदेश का बदलता समीकरण,” द हिन्दू, 15 मार्च 2023।

— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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