साहेब ने एक बार यात्रा की और अपने एक सहयोगी से कहा कि जब मैं पुणे में अपने आंदोलन के लिए लड़ रहा था, तब मुझे भीमा कोरेगांव के इतिहास के बारे में जानकारी मिली.
1973 में पहली बार पुणे से अपने तीन या चार साथियों के साथ साइकिल पर सवारी की थी. 6 दिसंबर, 1981 को DS4 बनाने के बाद साहेब ने 10 बड़े कार्यक्रमों के तहत बहुजन समाज के लिए संघर्ष के रूप में राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किए. इनमें से 6 कार्यक्रम अम्बायोगाई, अमरावती, नांदेड़, मुंबई, औरंगाबाद और नागपुर (महाराष्ट्र) में आयोजित किए गए.
उन्होंने उत्तर प्रदेश, गाजियाबाद, वाराणसी और लखनऊ में तीन और मध्य प्रदेश शहर रायपुर में एक कार्यक्रम आयोजित किया. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि महाराष्ट्र साहेब नागपुर में 6ठे कार्यक्रम के बाद यानी 26 जनवरी 1982 को अपने 500 साथियों के साथ महार वीर योद्धाओं को नमन करने भीमा कोरेगांव की धरती पर पहुंचे.
यहाँ आपकों जानकर हैरानी होगी कि यह पहला अवसर था जब विजय स्तंभ पर बहुजन नायक साहेब कांशीराम जी के नेतृत्व में 500 लोग इकठ्ठा हुए थे. पहले यहां नए साल के समय मुश्किल से 10-20 लोग इकट्ठा होते थे. साहिब के जाने से पहले यहां लगाए गए खंभों को ‘महारों का मंदिर’ के रूप में याद किया जाता था. उस से लेकर अगले साल यानी 1983 में साहेब के नेतृत्व में हजारों लोगों के रूप में सभा ने अपनी ताकत दिखाई.
हालांकि साहेब उन दिनों बहुत व्यस्त थे, फिर भी 1 जनवरी की जगह 2 जनवरी 1983 में ऊपर के कार्यक्रम में शामिल थे. साहेब के जाने के बाद ही लाखों लोग भीमा कोरेगांव आने लगे थे. हाँ बाबासाहेब जीते जी यहां जरूर आ रहे थे. 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव की जगह जमा हुए लाखों लोग साहेब कांशीराम को समर्पित हैं. क्योंकि बाबासाहेब के दुनिया से जाने के बाद बहुजन समाज भीमा कोरेगांव का इतिहास उनकी याद से लगभग भूल चुका था.
याद रखें 1 जनवरी 1818 को पेशवा राज्य को खत्म करने के लिए 28000 सैनिकों को नष्ट करने के बाद पुणे के कोरेगांव स्थान पर 500 महारे रखे गए थे.
(स्रोत: मैं कांशीराम बोल रहा हूँ का अंश; लेखक: पम्मी लालोमजारा, किताब के लिए संपर्क करें: 95011 43755)


