आरक्षण से मिली नौकरी एक कर्ज़ है उनका जिन्हें “अस्वच्छ” पेशों में सीमित कर दिया गया था क्या हम उनका कर्ज उतार पा रहे हैं?

हमें आरक्षण से जो नौकरी मिली है उसमें सफाई का काम करने वाले, मरे जानवर उठाने वाले, जूतों की मरम्मत करने वाले, दूसरों के कपड़े धुलने वाले और अनुसूचित जातियों के उन तमाम लोगों का छोटा-छोटा हिस्सा है जो दूसरे अस्वच्छ पेशों में लगे हुए हैं और जो मजदूरी कर रहे हैं. क्या हम अपने ऊपर से इस कर्ज को लौटा पा रहे हैं…?

बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों/जन जातियों के लोगों के लिए देश में 22.5 % नौकरियाँ उन सबके लिए तय करवाई थीं जिनकों जातिव्यवस्था के द्वारा सफ़ाई के काम, मरे जानवर उठाने के काम, दूसरों के कपड़े धोने जैसे अस्वच्छ पेशों में लगाया गया था. जिनकी आबादी उस समय 22.5% थी.

आज इस 22.5% हिस्से का मतलब है, आरक्षण से मिली प्रत्येक व्यक्ति की नौकरी में 24 करोड़ लोगों का छोटा-छोटा हिस्सा…

आरक्षण से जिन लोगों को नौकरियाँ मिली हैं वे इन 24 करोड़ लोगों के कर्ज को उतारने में बेहद “बेईमान” साबित हुए हैं. उन्हें आरक्षण से नौकरी मिल जाने के बाद उन लोगों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम करना चाहिए था जिन लोगों की संख्या के आधार पर उन्हें यह नौकरी मिली थी. उन्हें मानवता की दुश्मन “छुआछूत” को मिटाने का काम करना चाहिए था, उन्हें “जातिव्यवस्था” को ख़त्म करने के लिए काम करना था, उन्हें उस हर भेदभाव और ऊँच-नीच को ख़त्म करने के लिए काम करना चाहिए था जिनके द्वारा उन सब का इंसान होने का “दर्जा” और आगे बढ़ने के सारे अवसर छीन लिए गए थे.

बाबासाहेब ने “आरक्षण” की व्यवस्था ही इसलिए करवाई थी जिससे वे सब मिलकर इस “ऐतिहासिक अन्याय” को ख़त्म करने के लिए काम करें. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वे न तो उनसे ऊपर रखी गई जातियों के द्वारा किए जाने भेदभाव से मजबूती से लड़ सके और न ही वे अपने अंदर भरी छुआछूत और ऊँच-नीच की बीमारी को ख़त्म कर सके. जो लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं उनकी संख्या नाकाफ़ी है.

आरक्षण से नौकरी मिल जाने के बाद उन्होंने उनमें से किसी की तरफ मुड़कर नहीं देखा जिनकी संख्या के आधार पर उन्हें नौकरी मिली थी. सफ़ाई के काम में, मरे जानवर उठाने के काम में, जूतों की मरम्मत और कपड़े धोने के काम में लगे लोगों के बच्चों की मदद करने की बजाय इन्होंने उन्हें जातीय नफ़रत और छुआछूत का हर वह “दंश” दिया जिस दंश के लिए ये ऊपर की जातियों को गालियाँ देते रहे हैं.

अस्वच्छ पेशों में लगे लोगों को इंसान समझना और उनके बच्चों की शिक्षा में मदद करना तो दूर की बात इनमें से तमाम लोगों ने अपने से नीचे रखी गई उन तमाम जातियों के लोगों के साथ भी “इंसानियत” का बर्ताव नहीं किया जो किसी तरह “अस्वच्छ” पेशों को छोड़ चुके हैं. जातीय नफ़रत से भरे “डंक” से वे हमारे जैसे लोगों को भी अक्सर आहत करते रहते हैं.

मैं अपने शहर की आवास विकास कॉलोनी में लगभग 5 साल किराए पर रहा, अपनी ही जाति के व्यक्ति के जिस घर में मैं किराए पर रह रहा था उस घर के सामने उन कई लोगों के बंगले बने हुए हैं जिन्हें आरक्षण से नौकरियाँ मिली थीं. 5 साल रहने के दौरान उनमें से किसी ने भी एक कप चाय के लिए बुलाना तो दूर की बात, मुझे अपने बंगले के गेट पर खड़े होने की कभी गुंजाइश नहीं दी. उनकी इस मक्कारी की वजह से इस देश की 22.5% आबादी आज भी “अछूतपन” से बाहर नहीं निकल सकी.

इन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसकी उम्मीद बाबासाहेब ने इनसे की थी. इनकी बेईमानी और मक्कारी के कारण बुरे हालातों में जी रहे इस 22.5% हिस्से के आगे बढ़ने की एकमात्र उम्मीद 22.5 आरक्षण ख़त्म होने के कगार पर है. ऐसा नहीं है कि उनकी इस बेईमानी का असर उनके ख़ुद के बच्चों पर न पड़ रहा हो, इसका असर उनके बच्चों पर भी पड़ रहा है. आवास विकास में जिनके बंगले बने हुए हैं उनके बच्चे आज “परचून” की दुकानें खोलें हुए हैं.

अस्वच्छ पेशों में लगे लोगों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए मैं जितना भी कर रहा हूँ वह भी नाकाफ़ी है. उनका कर्ज उतारने के लिए हमें और तेज़ी से काम करना होगा. यह काम हमारा उन पर किसी भी प्रकार का एहसान नहीं होगा बल्कि कर्ज़ की वापसी होगी, उस कर्ज की जो मेरी नौकरी में उनका है.

(लेखक: शैलेंद्र फ्लैमिंग; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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