मेरे विचार से ‘दहेज़’ को किसी लड़की का अपने माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं माना जा सकता. यह बालिकाओं को शिक्षा से वंचित करने का उपाय भर है. भारतीय समाज में तमाम गड़बड़ियों को पैदा करने के लिए ही रोपित किया गया है. यहाँ जब बच्चों की शिक्षा के लिए पैसे की सख्त जरूरत होती है उस समय गरीब परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर पैसे ख़र्च करने की बजाय अपनी पुत्री के लिए ‘दहेज़’ का सामान ख़रीदने पर अपना पैसा ख़र्च करते हैं. अपनी लड़की की शादी में दहेज़ का इंतजाम करने की ख़ातिर माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च से पैसे की कटौती करते हैं. शादी अमूमन एक पुरूष और एक स्त्री का एक साथ रहने का समझौता होता है न कि माता-पिता द्वारा एक पुरूष को एक महिला (पुत्री) का ‘दान’ करना…
एक स्त्री और एक पुरूष का एक दूसरे से अच्छी तरह वाकिफ़ होने के बाद साथ में रहने के फ़ैसले का नाम ‘शादी’ होता है जबकि इस देश में मानवता की दुश्मन ‘जातिव्यवस्था’ को बचाए रखने के लिए शादी की मूल भावना से खिलवाड़ कर दिया गया है. कितना अजीबोगरीब है, जिनको एक साथ रहना है उनकी पसन्द नापसंद की यहाँ कोई अहमियत नहीं रखी गई है. यहाँ जाति को अजर-अमर बनाए रखने के लिए पिता अपनी पुत्री के वयस्क होने से पहले उसे किसी ऐसे व्यक्ति को दान कर देता है जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानती.
इस देश में खासतौर से ग़रीब घरों में जब लड़की जन्म लेती है तब माता-पिता को उसकी शिक्षा की चिंता नहीं होती. उसके दहेज़ के लिए चीज़ें जुटाने की चिंता होती है. लड़की के जन्म लेते ही वे पैसा इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं. जैसे-जैसे पैसे इकट्ठा होते जाते हैं वैसे-वैसे वे अपनी पुत्री को दहेज़ में देने के लिए चीज़ें खरीदते जाते हैं. कभी वे उसके लिए पायल बनवा लाते हैं तो कभी झुमकी, कभी सोने के कंगन बनवा लाते हैं तो कभी मंगलसूत्र…
इन सब के बीच में उस लड़की की ‘शिक्षा’ पीछे छूट जाती है. जिन लोगों ने इस देश में ‘जातिव्यवस्था’ क़ायम की है वे यही चाहते हैं. वे कभी नहीं चाहते कि आपकी पुत्री शिक्षा हासिल करे; क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर वह शिक्षा हासिल करेगी तो वह अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करना सीख जाएगी और अगर वह अपने दिमाग का इस्तेमाल करने लगी तो उनकी बनाई तमाम रीति-रिवाजों को ध्वस्त कर देगी. वह आगे पहुँचकर अपनी मर्ज़ी दूसरी जाति में शादी करके जातिव्यवस्था को नष्ट कर सकती है. इसीलिए भारतीय समाज में ‘बालविवाह’ और ‘दहेजप्रथा’ चलन में लाई गई. कुछ लोग कहते हैं कि माता-पिता की संपत्ति में पुत्री का जो अधिकार होता है उसकी एवज़ में उस संपत्ति को वे अपनी पुत्री को दहेज़ के रूप में देते हैं. यह सरासर ग़लत है. दहेज़ के रूप में दिया गया सारा सामान कुछ ही सालों में नष्ट हो जाता है और फ़िर लड़की के पास कुछ नहीं बचता. मेरे विचार से दहेज़ उस उपाय का भी नाम है जिसके द्वारा एक लड़की का अपने माता-पिता की सम्पत्ति में हिस्से को उसके माता-पिता से हासिल कर छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है.
फ़िर एक पुत्री का अपने माता-पिता की संपत्ति में अधिकार कैसे मिले?
मेरे विचार से हमें ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जिसमें माता-पिता अपने पैसे का इस्तेमाल सबसे पहले अपनी पुत्री और पुत्र की शिक्षा, उनके अच्छे खानपान और उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने पर करें. इस सबके बाद जो भी संपत्ति बचती है उसका बँटवारा प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए. जो बुढ़ापे पर आपके देखभाल की जिम्मेवारी ले उसका हिस्सा अधिक और जो ऐसा न कर सके उसका हिस्सा कम हो…
जातिव्यवस्था को बनाए रखने के लिए किए गए इस उपाय को ख़त्म करने में वे लोग भी बुरी तरह से असफल रहे हैं जो बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर को मानते हैं और इस देश में ‘जातिव्यवस्था’ को नष्ट कर समानता स्थापित करने की बात करते हैं.
(लेखक: शैलेंद्र फ्लैमिंग; ये लेखक के निजी विचार हैं)

