18.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

ओपिनियन: महापुरुष किसी एक जाति के नहीं होते

सब अपने भाटों की पौथियाँ लिए आ रहे है, दावे प्रतिदावे किये जा रहे है, इतिहास बनाने की हवा हवाई इस कवायद से हमारा वर्तमान कलुषित हो रहा है, इस खतरे पर दोनों समाजों को सोचना पड़ेगा कि यह टकराव कहीं स्थायी दुराव न बन जाये.

महापुरुषों और महास्त्रियों का जातिय विभाजन अब खतरनाक दौर में पहुंच चुका है, अब हर आदर्श व्यक्तित्व को जातिगत सीमाओं में आबद्ध किया जा चुका है.

महामानवों की जातिय घेराबंदी के हम सब बराबर के अपराधी है, कोई भी इससे बरी नहीं है, हम सबने महापुरुषों को अपनी-अपनी जातियों तक सीमित करने का काम किया है.

दरअसल यह पूरा अभ्यास ही इसलिए है कि हम जातिय हीनता या श्रेष्ठता की ग्रंथि से ग्रन्थित है ,मैं भी आरएसएस छोड़ने के बाद धार्मिक श्रेष्ठता से थोड़ा नीचे उतरा और जातिय व उपजातीय श्रेष्ठता की परियोजना में लग गया.

इस मूर्खतापूर्ण अभ्यास से कईं तरह की ऐसी चीजें निकली या निकाली गई, जिस पर आज सोचता हूँ तो खुद का उपहास करने की इच्छा होती है या खुद को आलोचित करने की भावना बनती है.

हम सब एक व्यापक समाज का हिस्सा है, इसी ग्रह के, इसी धरती के वासी, हम मंगल ग्रह से तो नही आते है, हमारी विचार प्रक्रिया इसी समाज से बनती है, हम एक किस्म की कंडीशनिंग के शिकार हो जाते है, हम हर मसीहा और नायक को खुद से और खुद की जाति से जोड़ लेते हैं.

1940 से लेकर 1980 तक की हिंदू समुदाय की विभिन्न जातियों के इतिहास लेखन को देखकर हम इस प्रक्रिया को ठीक से समझ सकते हैं, इन चार दशकों में दलित व आदिवासी तथा शुद्र जातियों के जितने भी इतिहास ग्रंथ रचे गये, उनका मूल स्वर यह रहा है कि हम पहले ब्राह्मण थे अथवा क्षत्रिय थे, कहने का भाव यह था कि सक्षम से खुद को जोड़ लेना ताकि खुद सबल महसूस कर सके. यह एक प्रकार से जातिय हीनता की ग्रंथि से मुक्त होने का प्रयास रहा है.

1980 के बाद का इतिहास लेखन महापुरुषों को अपनी जाति में लाने का रहा, इसके जरिये सबसे पहले तो भारतीय आदर्शों, नायकों और महापुरुषों की जातियां खोजी गई, जिनका पता था, उसके लिए कुछ खास नहीं करना पड़ा, अपनी जाति का लेबल उक्त महापुरुष पर तुरन्त चस्पा कर दिया, जो लोग देवता या अवतार अथवा लोकदेवता किस्म के महापुरुष थे, उनको अपनी-अपनी जाति की गोलबंदी में लाने का प्रयास हुआ है.

दरअसल यह उन महामानवों के जातिकरण से ज्यादा स्वयम की जाति को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास मात्र रहा है, यह आज भी जारी है.

मैं इसलिए साधिकार यह लिख रहा हूँ, क्योंकि मैं इस किस्म के इतिहास लेखन परियोजनाओं का सक्रिय हिस्सा रहा हूँ, लगभग डेढ़ दशक पूर्व ऐसा ही लेखन मैंने भी किया, जिसमें विभिन्न महापुरुषों के जातिकरण का काम हुआ है, आज वह सब व्यर्थ सी कवायद लगती है, लेकिन उस वक़्त तो काफी गंभीरता से यह काम किया गया था.

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो खुद पर हंसने का और आक्रोशित होने का मन करता है, आज तो बुद्ध, कबीर, रैदास, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई, राम, कृष्ण, परशुराम, तेजाजी, देवनारायण, रामदेवजी, गांधी, पटेल, नेहरू, बाबासाहेब अम्बेडकर, लोहिया, जेपी सबको जातियों में कैद कर लिया गया है.

हर कोई इन पर दावा ठोंक रहा है, हर किसी को इनको अपनी जाति के घेरे में लेने की जल्दी है, हालात यह हो चुके हैं कि अब गांधी को चालाक बनिया कहा जा रहा है तो अम्बेडकर को सिर्फ महार, महाराणा प्रताप की जयंती अब विशेष समुदाय की जिम्मेदारी बन गई है तो शिवाजी अब सिर्फ मराठों के होते जा रहे हैं.

राजस्थान में ताजा विवाद लोकदेवता रामसा पीर को लेकर है जिसमें लोकप्रचलित बात यह है कि वे सदेह अवतरित हुए थे, मतलब उनके कोई लौकिक माता पिता न थे, लेकिन लोक में मान्यता यह भी है कि वे तंवर वंशीय क्षत्रिय अजमल जी के पुत्र थे, इससे इतर आध्यात्मिक जगत में यह किंवदंती सदैव विद्यमान रही कि वे मेघ रिख परम्परा के संत सायर के पुत्र थे. दोनों बातें अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में मौजूद रही, लेकिन विवाद का विषय कभी नहीं बना, अब सोशल मीडिया ने यह कर दिखाया है, दो समुदायों की मान्यताएं टकराव का कारण बन रही है.

एक वो समुदाय जो रामदेव जी को मानता है और पूजता है, वह उन्हें अपने समुदाय का मानता है, जबकि दूसरा वो समुदाय है जो उनको न मानता, न पूजता है, न उनके मोहल्लों में उनके मन्दिर है, न उनकी आध्यात्मिक प्रक्रिया वो अपनाते है, मगर सक्षम समुदाय है, वर्णाश्रम धर्म में यह श्रेष्ठता को प्राप्त समुदाय है, हर दृष्टि से आज भी मजबूत है, उनका भी दावा है कि रामदेव पीर उनके घराने में पैदा हुए थे.

600 साल पहले कौन कहाँ पैदा हुआ, क्या था, कैसा था, उसका कोई भी अधिकृत प्रमाण किसी के पास नहीं बचा है, सब अपने भाटों की पौथियाँ लिए आ रहे है, दावे प्रतिदावे किये जा रहे है, इतिहास बनाने की हवा हवाई इस कवायद से हमारा वर्तमान कलुषित हो रहा है, इस खतरे पर दोनों समाजों को सोचना पड़ेगा कि यह टकराव कहीं स्थायी दुराव न बन जाये.

हालांकि मैं स्वयं भी इस जातिय इतिहास लेखन परियोजना में शरीक रहा हूँ, मेरी इस संबंध में किताब भी आई है, पर आज मैं कहना चाहता हूं कि स्वर्णिम अतीत के इतिहास उत्खनन का यह काम सर्वथा निर्रथक रहा, इससे कुछ भी हासिल न हुआ और न ही होगा, बेहतर होगा कि हम महामानवों को जातियों से मुक्त कर दें, न महाराणा प्रताप सिर्फ क्षत्रिय थे और न ही तथागत बुध्द महज शाक्य और न ही रामदेव जी सिर्फ तंवर अथवा मेघवाल.

हम महापुरुषों को उनकी महानता के साथ सिर्फ महापुरुष ही रहने दें, अपनी-अपनी जातिय क्षुद्रता व श्रेष्ठता को अपने तक ही सीमित रखें, रामदेव जी की महानता का परिचय देने के लिए किसी मेघवाल महासभा या करणी सेना की जरूरत नहीं है, रामदेव जी जातियों से ऊपर है, वे वहां है जहां तक जातियों की कभी पहुंच नहीं रही है और न ही रहेगी.

जातिय नफरत की हर गलती को मिलकर रोकना होगा, गलती किसी से भी हुई हो, बहुत सारी बातें भूलकर आगे बढ़ना होगा, कभी-कभी भूलना भी राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता अखंडता को मजबूत करता है.

इतिहास अगर हमारे आज और भविष्य के लिए खतरनाक हो तो उस इतिहास को दफन कर देना ही उचित होगा.

(लेखक: भंवर मेघवंशी; यह लेखक के अपने विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...