इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित वर्गों की स्वतंत्र आवाज को दबाकर मनुवादी शक्तियों ने सदियों से देश पर अपना आधिपत्य जमाया है। यह मनुवादी व्यवस्था न केवल सामाजिक अन्याय की जड़ रही है, बल्कि उसने राष्ट्र के समग्र विकास को भी अवरुद्ध किया है। आधुनिक भारत में जब परम पूज्य बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस कुव्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का झंडा बुलंद किया, तो शुरुआत में उन्हें उपेक्षित (ब्लैकआउट) किया गया। किंतु जैसे-जैसे उनकी प्रखर बुद्धि और अटूट संकल्प मनुवादी ढांचे को चीरता हुआ आगे बढ़ा, जातिवादी शक्तियों ने उन्हें बदनाम करने के षड्यंत्र रचे। बालगंगाधर तिलक के ‘केसरी’ से लेकर कांग्रेस के मंचों तक, शंकराचार्यों के प्रवचनों से लेकर साहित्यिक रचनाओं तक, सभी ने बाबासाहेब को खलनायक सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। फिर भी, बाबासाहेब की महानता इसमें निहित थी कि उन्होंने मनुवादी बेड़ियों से भारतीय समाज को मुक्त कराने का आंदोलन अनवरत जारी रखा।
जातिवादी शक्तियों ने शोषित समाज को गुमराह करने के लिए कभी उन्हें ‘हरिजन’ जैसे मधुर लगने वाले किंतु अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया, तो कभी बाबासाहेब के समकक्ष परतंत्र राजनीति के प्रतिनिधियों को आगे बढ़ाया। बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण और स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। अछूत समाज का एकमुश्त वोट कांग्रेस की झोली में गिरा, और परतंत्र नेताओं को बड़े पदों से नवाजा गया। यह वह दौर था जब स्वतंत्र बहुजन आवाज रुक सी गई थी।
किंतु इतिहास की धारा को मोड़ने वाले महापुरुष कभी पराजित नहीं होते। बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण के बाद मान्यवर श्री कांशीराम साहेब और आदरणीया बहन मायावती जी ने इस रुकी हुई आवाज को नई ऊर्जा प्रदान की। शोषित समाज गुमराहियों के जाल से बाहर निकला। इन दोनों महान हस्तियों ने बाबासाहेब के कारवां का प्रतीक ‘हाथी’ जंगल से पकड़कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ मजबूती से जोड़ा। शुरुआत में मान्यवर साहेब और बहनजी को मीडिया और राजनीतिक मंचों से ब्लैकआउट किया गया। किंतु जब बाबासाहेब का यह कमजोर पड़ चुका हाथी उनकी देख-रेख में हृष्ट-पुष्ट होने लगा, तो जातिवादी शक्तियों ने नए षड्यंत्र रचे। मान्यवर साहेब को विदेशी एजेंट (सीआईए एजेंट) बताकर और बहनजी को जातिवादी करार देकर बदनाम करने की कोशिशें (ब्लैकमेल) हुईं। जब इससे कारवां नहीं रुका, तो जातिवादी संगठनों, साहित्यकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया ने मिलकर मान्यवर साहेब के विकल्प खड़े करने के प्रयास किए।
इस संदर्भ में बहुजन आंदोलन को पिछले चार दशकों से अनवरत सेवा प्रदान करने वाले श्री अमरनाथ ‘निडर’ जी का कथन अत्यंत प्रेरणादायी है। जब उनसे पूछा गया कि बाबू जगजीवन राम और मान्यवर कांशीराम साहेब में बड़ा नेता कौन है तथा दोनों में अंतर क्या है, तो उन्होंने उत्तर दिया—’बाबू जगजीवन राम चंद्रमा के समान हैं और मान्यवर साहेब सूर्य हैं। चंद्रमा दूसरों के प्रकाश से आलोकित होता है, जबकि सूर्य स्वयं प्रकाशित होता है।’ यह उपमा न केवल दोनों नेताओं के परतंत्र और स्वतंत्र चरित्र को उजागर करती है, बल्कि बहुजन राजनीति के सार को भी स्पष्ट करती है।
मान्यवर साहेब के बाद भी जातिवादी राजनीतिक दल, संगठन, विश्लेषक, मीडिया और परतंत्र नेता (चमचों) आदरणीया बहनजी के विरुद्ध वही षड्यंत्र दोहरा रहे हैं, जो पहले बाबासाहेब और फिर मान्यवर साहेब के साथ किए गए। किंतु आज भी बाबासाहेब, मान्यवर साहेब और आदरणीया बहनजी की त्रिमूर्ति तथा जातिवादी शक्तियों द्वारा खड़े किए गए परतंत्र नेताओं में वही मूलभूत अंतर विद्यमान है—सूर्य का स्वप्रकाश और चंद्रमा का परावलंबी उजाला।
इतिहास साक्षी है कि किसी भी समुदाय की सच्ची मुक्ति केवल उसकी स्वतंत्र राजनीति से ही संभव है। परतंत्र कठपुतलियों की झूठी नेतागिरी से तो केवल शोषण और गुलामी की बेड़ियां मजबूत होती हैं। इसलिए, इतिहास से सबक लेते हुए बहुजन समाज को स्वतंत्र और परतंत्र राजनीति के इस सूक्ष्म भेद को गहनता से समझना होगा। परम पूज्य बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब और आदरणीया बहन मायावती जी के इस महान कारवां को और अधिक मजबूत बनाते हुए समतामूलक समाज की रचना करनी होगी, ताकि भारत का राष्ट्र निर्माण सच्चे अर्थों में हो सके।
बाबासाहेब, मान्यवर साहेब और आदरणीया बहनजी का यह महान कारवां न रुका है, न रुकेगा। यह सूर्य की किरणों सा स्वतंत्र और तेजोमय आगे बढ़ता रहेगा, बहुजन समाज की मुक्ति और राष्ट्र की समृद्धि का पथ प्रशस्त करता हुआ।


