मानव-मन की सबसे गहन जिज्ञासा वह नहीं है जो तारों की दूरी मापती है, न ही वह जो समुद्र की गहराई को छूने की कोशिश करती है; वह जिज्ञासा है जो स्वयं को ही संबोधित करती है—‘मैं कौन हूँ?’ और उसके ठीक पीछे छिपा हुआ वह सबसे विस्फोटक प्रश्न—
‘ईश्वर ने मुझे बनाया है, या मैंने ईश्वर को गढ़ा है?’
यह प्रश्न न केवल एक दार्शनिक कौतुहल है, अपितु वह चाबी है जो सहस्राब्दियों से लटकी हुई मानसिक बेड़ियों को खोल सकती है। फिर भी, आश्चर्यजनक रूप से, अधिकांश समाज इसी प्रश्न को सबसे अधिक सतर्कता से टालते हैं, जैसे कोई विषैला फल जिसे छूने मात्र से ही पाप का भय हो।
सभी प्रश्नों पर विचार करने की छूट है—राजनीति पर, अर्थव्यवस्था पर, युद्ध पर, प्रेम पर, मृत्यु पर—परंतु जैसे ही बात ईश्वर, अल्लाह, गॉड तक पहुँचती है, वातावरण में एक अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती है। वहाँ प्रश्न नहीं, केवल श्रद्धा की अपेक्षा की जाती है। संदेह को अपराध घोषित कर दिया जाता है, जिज्ञासा को विधर्मिता का नाम दे दिया जाता है। यह संयोग नहीं है; यह एक सुनियोजित व्यवस्था है।
जब मनुष्य ने अपनी असीमित शक्ति—प्रेम, बुद्धि, सृजन, करुणा, न्याय—को स्वयं से अलग कर एक परम सत्ता में प्रक्षेपित कर दिया, तब उसने न केवल ईश्वर की रचना की, अपितु स्वयं की परम पराजय भी स्वीकार कर ली। उसने कहा, “ये गुण मुझमें नहीं, उनमें हैं। मैं क्षुद्र हूँ, वे महान। मैं पापी हूँ, वे पवित्र। मैं सीमित हूँ, वे अनंत।” इस एक क्रिया में उसने अपनी संपूर्ण गरिमा को एक काल्पनिक सिंहासन पर चढ़ा दिया और स्वयं घुटनों पर बैठ गया।
यह प्रक्षेपण मात्र मनोवैज्ञानिक घटना नहीं रहा; यह शक्ति की सबसे चतुर संरचना बन गया। जिस समाज में ईश्वर की अवधारणा सर्वोच्च सत्य बन जाती है, वहाँ प्रश्न पूछने वाला विद्रोही नहीं, अपितु अपराधी बन जाता है। क्योंकि प्रत्येक प्रश्न ईश्वर की एकता को चुनौती देता है, और ईश्वर की एकता के साथ ही उस विशेष वर्ग की एकता भी जो स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर चुका है।
जो लोग कहते हैं कि ईश्वर ने नैतिकता दी, वे भूल जाते हैं कि नैतिकता का जन्म प्रश्न से होता है, आज्ञा से नहीं। जो लोग कहते हैं कि ईश्वर ने समाज को एक सूत्र में बाँधा, वे यह नहीं देखते कि उस सूत्र ने ही बहुसंख्यक को गुलामी की नींद में सुला रखा है। धर्म जब सत्य की खोज बनने के बजाय आज्ञाकारिता का माध्यम बन जाता है, तब वह बौद्धिकता का श्मशान बन जाता है।
सच तो यह है कि ईश्वर की अवधारणा ने मनुष्य को दो भागों में बाँट दिया—एक वह अल्पसंख्यक जो ‘ईश्वर जानता है’ कहकर शेष को नियंत्रित करता है, और दूसरा वह बहुसंख्यक जो ‘ईश्वर ने ऐसा चाहा’ कहकर नियंत्रित होता है। यह विभाजन शारीरिक गुलामी से कहीं अधिक गहन और स्थायी है—यह आत्मा की गुलामी है।
यदि कोई समाज सचमुच मुक्त होना चाहता है, तो उसे सबसे पहले उस प्रश्न को पुनर्जीवित करना होगा जिसे सदियों से दफनाया जाता रहा है:“ईश्वर ने मनुष्य को बनाया, या मनुष्य ने ईश्वर को?”
इस प्रश्न का उत्तर जो भी हो—आस्तिक का, नास्तिक का, अज्ञेयवादी का—उससे अधिक महत्वपूर्ण है प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता स्वयं। क्योंकि जिस दिन यह प्रश्न निर्भीक होकर पूछा जाने लगेगा, उसी दिन मानसिक गुलामी की दीवारें दरकना आरंभ हो जाएँगी।और तब मनुष्य समझ जाएगा कि वह न तो ईश्वर का दास है, न ही ईश्वर का सृजन मात्र—वह स्वयं एक सृजनकर्ता है, एक प्रश्नकर्ता है, एक स्वतंत्र चेतना है।
तब तक, जब तक यह प्रश्न निषिद्ध रहेगा, तब तक बौद्धिकता की ज्योति धुँधली रहेगी, और गुलामी—मानसिक गुलामी—का अंधेरा छाया रहेगा। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम उस प्रश्न को फिर से जीवित करने का साहस रखते हैं?


