लोकतंत्र को कमजोर करेगा ‘One Nation, One Election’

चंद उच्च जातियों और धन्नासेठों की मंशा भारत के लगभग 125 करोड़ दलित, आदिवासी, पिछड़े और अकिलियत समाज की मंशा नहीं हो सकती है. इसलिए One Nation, One Election का समर्थन भारत के गतिमान लोकतंत्र की हत्या होगी.

One Nation, One Election देश में लोकतंत्र को कमजोर करने की साज़िश है. दलित, आदिवासी, पिछड़े और अकिलियत समाज की आवाज को दबाने, उनकी राजनीति को खत्म करने का सुनियोजित षड़यंत्र है. इससे देश में सरकार की जवाबदेही कमजोर होगी. सरकार की तानाशाही बढ़ेगी. विपक्ष लापरवाह होगा. यह व्यवस्था देश में Two Party (दो दलीय) प्रणाली की अघोषित शुरुआत होगी.

इलेक्ट्रोल बांड के संदर्भ में आयी रिपोर्ट से स्पष्ट है कि उद्योग घरानों व धन्नासेठों को अलग-अलग तमाम पार्टियों को फंड करना पड़ता है लेकिन One Nation, One Election के तहत उन्हें केवल दो पार्टियों को, वो भी पांच साल में सिर्फ एक बार, ही फंड करना पड़ेगा. तथाकथित उच्च जातियों के दलों को दलितों व आदिवासियों के घरों में पांच साल में सिर्फ एक ही बार खिचड़ी खानी पड़ेगी. इससे तथाकथित उच्च जातियों और धन्नासेठों को जबरदस्त सामाजिक व वित्तीय लाभ होगा. सरकार और विपक्ष की गर्दन पर जनता की नहीं बल्कि जनता की गर्दन पर सरकार, विपक्ष व धन्नासेठों की पकड़ मजबूत होगी जो कि लोकतंत्र को वेंटिलेटर पर रखने जैसा होगा.

One Nation, One Election से उच्च जातियों की पार्टियों को सीधा फायदा होगा. उद्योग घरानों को पांच साल में सिर्फ एक बार चंदा देना होगा. इससे उच्च जातियों और उद्योग घरानों को फायदा होगा लेकिन लोकतंत्र कमजोर होगा. मुट्ठी भर उच्च जातियों और उंगली पर गिने जा सकने वाले उद्योगों घरानों का फायदा देश का फायदा नहीं बल्कि जातिवाद को बढ़ावा और क्रोनी कैपिटालिज्म है. चंद उच्च जातियों और धन्नासेठों की मंशा भारत के लगभग 125 करोड़ दलित, आदिवासी, पिछड़े और अकिलियत समाज की मंशा नहीं हो सकती है. इसलिए One Nation, One Election का समर्थन भारत के गतिमान लोकतंत्र की हत्या होगी.

कुछ लोग को लगभग हर छ: महीने में कहीं ना कहीं होने वाले चुनावी खर्चों से दिक्कत होती है लेकिन ऐसे लोगों से हमारा स्पष्ट कहना है कि ‘देश के लोकतंत्र का स्वास्थ्य चुनावी खर्चों से नहीं बल्कि सरकार और विपक्ष की लगातार और ज्यादा से ज्यादा जवाबदेही से तय होती है.’ हमारे लिए चुनावी खर्चे नहीं बल्कि सरकार और विपक्ष की लगातार व ज्यादा से ज्यादा जवाबदेही जरूरी है. लोकतंत्र जरूरी है. सरकार और विपक्ष पर जनता, खास कर बहुजन समाज, का शिकंजा जरूरी है.

One Nation, One Election के तहत सरकार और विपक्ष पांच साल में सिर्फ एक बार जनता के प्रति जवाबदेह होंगे जबकि मौजूदा व्यवस्था में सरकार और विपक्ष दोनों को लगभग हर छ: महीने में जनता के बीच जाकर ज़वाब देना होता है. इससे सरकार और विपक्ष दोनों पर जनता का शिकंजा कसा रहता है जो कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनतंत्र के स्वास्थ्य का परिचायक है.

One Nation, One Election में सरकार बेलगाम हो जायेगी. विपक्ष लापरवाह हो जायेगी. ये दोनों चुनाव के चंद महीने पहले उद्योग घरानों की दौलत से मीडिया के जरिए अपने एजेंडे के तहत जनता को फांसकर सत्ता-विपक्ष में अदला-बदली चलती रहेगी और देश में लगभग 125 करोड़ की आबादी वाला दलित, आदिवासी, पिछड़े और अकिलियत समाज की जनता पीसती रहेगी.

ऐसे में कमजोर लोकतंत्र (One Nation One Election) से सीधा और एकमात्र नुकसान दलित, आदिवासी, पिछड़े और अकिलियत समाज को होगा, जातिगत भेदभाव व छुआछूत के शिकार तबके को होगा. उनकी आवाज़ कमजोर पड़ेगी. उनकी आत्मनिर्भर राजनीति कमजोर होगी. इससे इन वर्गों के संवैधानिक अधिकारों को किनारे करने, उच्च जातियों व धन्नासेठों की शोषणवादी मंशा को अंजाम देना आसान होगा. देश में 125 करोड़ की आबादी वाले बहुजन समाज की आवाज को दबाकर, उनकी आत्मनिर्भर राजनीति को खत्म करना लोकतंत्र की हत्या करना है. लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म कर भारतीय राजव्यवस्था को जातिवादियों और पूंजीपतियों के हवाले कर देश की सामाजिक व्यवस्था के अंतिम पायदान पर खड़ी जनता को इन जातिवादियों और पूंजीपतियों के रहमो-करम पर छोड़ना होगा जो कि बाहरी आक्रांताओं की बेरहम हुकूमत से भी ज्यादा क्रूर होगा. इसलिए हम One Nation One Election प्रणाली का पुरजोर विरोध करते हैं.

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