भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही हैं। फिर भी, आस्था के नाम पर असहिष्णुता और अत्याचार की घटनाएँ बार-बार हमारे सामने आ खड़ी होती हैं। इनमें एक विचित्र किंतु गहन चिंतन की माँग करने वाली स्थिति यह है कि जिस एकमात्र परम सत्ता को विभिन्न धर्म अलग-अलग नामों से पुकारते हैं—ईश्वर, अल्लाह, गॉड आदि—उन नामों पर टिप्पणी करने की प्रतिक्रिया भी अलग-अलग धर्मों में पूरी तरह भिन्न होती है, जबकि सभी की मौलिक मान्यता यही है कि ये सब एक ही हैं।
जब कोई ‘ईश्वर’ के अस्तित्व पर सवाल उठाता है या टिप्पणी करता है, तो मुख्य रूप से हिंदू समुदाय आहत महसूस करता है और प्रतिक्रिया देता है, जबकि मुस्लिम और क्रिश्चियन अनुयायी आमतौर पर मौन रहते हैं। उल्टे, जब ‘अल्लाह’ पर कोई टिप्पणी होती है, तो मुस्लिम समुदाय संवेदनशील हो उठता है, लेकिन हिंदू और क्रिश्चियन चुप रहते हैं। इसी तरह, ‘गॉड’ या ईसा मसीह पर सवाल उठने पर क्रिश्चियन आहत होते हैं, जबकि अन्य धर्मों के लोग खामोश रहते हैं या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर समर्थन करते हैं।
यह स्थिति और भी दिलचस्प इसलिए हो जाती है क्योंकि एक सामान्य धारणा यह है कि ईश्वर, अल्लाह और गॉड आदि एक ही सर्वोच्च तथाकथित दैवीय सत्ता के अलग-अलग नाम मात्र हैं। ये सभी एक-सृजनकर्ता, पालनकर्ता, संहारक, सर्वव्यापी, सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान-शक्ति को संबोधित करते हैं। विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और धार्मिक परंपराओं में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है – संस्कृत-हिंदी परंपरा में ईश्वर, अरबी-इस्लामी परंपरा में अल्लाह, और पश्चिमी-क्रिश्चियन परंपरा में गॉड। गुण और भूमिका में पूर्ण समानता होने के बावजूद, इन नामों पर टिप्पणी क्यों इतनी चुनिंदा और एकतरफा प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है?
और भी रोचक बात यह है कि जो समुदाय एक नाम पर एकाधिकार मानता है, वह अक्सर अन्य नामों पर टिप्पणी करने से नहीं चूकता। ईश्वर को अपना मानने वाले कभी-कभी अल्लाह या गॉड पर सवाल उठाते हैं। अल्लाह को सर्वोच्च मानने वाले ईश्वर या गॉड की अवधारणा पर टिप्पणी करते हैं। गॉड को एकमात्र सत्य मानने वाले हिंदू ईश्वर या इस्लामी अल्लाह को कमतर बताने में संकोच नहीं करते। ये समुदाय आपस में लड़ते हैं, बहस करते हैं, खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं। जबकि मूल मान्यता यही है कि ये तीनों नाम एक ही तथाकथित दैवीय सत्ता के विभिन्न भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक नाम हैं।
यदि वास्तव में ये लड़ाइयां उस एकमेव तथाकथित दैवीय सत्ता की रक्षा या सम्मान के लिए होतीं, तो स्थिति बिल्कुल अलग होती। ईश्वर पर टिप्पणी होने पर न केवल हिंदू, बल्कि मुस्लिम और क्रिश्चियन भी आहत होते। अल्लाह पर सवाल उठने पर हिंदू और क्रिश्चियन भी मुस्लिमों के साथ खड़े होते। गॉड पर प्रश्नचिन्ह लगने पर हिंदू और मुस्लिम दोनों क्रिश्चियनों की भावनाओं का सम्मान करते। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है। हर समुदाय केवल अपने विशेष नाम के सन्दर्भ में ही आगे आता है, बाकी मौन रहता है या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर खुला समर्थन करता है।
यह साफ संकेत है कि यह लड़ाई ईश्वर, अल्लाह या गॉड आदि के लिए नहीं है। यह लड़ाई भाषा, धर्म और संस्कृति की है। यह व्यक्तिगत और सामूहिक महत्वाकांक्षा एवं अहंकार की है – अपनी परंपरा को प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ की है। जब हम किसी नाम पर आहत होते हैं, तो वास्तव में हम अपनी भाषाई पहचान, अपनी सांस्कृतिक विरासत और अपने धार्मिक समूह की श्रेष्ठता पर आघात महसूस करते हैं। यह तथाकथित दैवीय सत्ता (ईश्वर, अल्लाह और गॉड आदि) की चिंता कम, अपनी पहचान व अहंकार की रक्षा ज्यादा है।
हिंदू धर्म में अवतारों की बहुलवादी प्रकृति के कारण ईश्वर की अवधारणा लचीली है, फिर भी आज के समय में पहचान (हिंदुत्व) की राजनीति ने इसे संवेदनशील बना दिया है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी जैसे एकेश्वरवादी धर्मों में विशेष नाम (अल्लाह या गॉड) सीधे उनके मूल विश्वास से जुड़ा होता है, इसलिए उस पर टिप्पणी पूरे धर्म को चुनौती लगती है। लेकिन अंततः, सभी मामलों में प्रतिक्रिया किसी दैवीय सत्ता की तथाकथित रक्षा या सम्मान से ज्यादा सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई अहंकार से प्रेरित होती है।
यदि हम गहराई से सोचें, तो ये सभी धर्म एक ही सत्य- तथाकथित दैवीय सत्ता: ईश्वर, अल्लाह और गॉड आदि-की ओर इशारा करते हैं। हिंदू दर्शन का सूत्र ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ – सत्य एक है, ब्रह्मण उसे अनेक नामों से पुकारते हैं – इसी एकता को रेखांकित करता है। सूफी परंपरा और क्रिश्चियन विचारक भी सर्वोच्च दैवीय सत्ता की एकता पर बल देते हैं। फिर भी, मानवीय कमजोरियां–संकीर्णता, श्रेष्ठता की भावना और समूहीय अहंकार–उन्हें विभेद की राह पर ले जाती है।
भारत जैसे बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी समाज में साम्प्रदायिकता जैसी बीमारी का सच्चा समाधान केवल संवाद, शिक्षा और गहरी व सच्ची सहिष्णुता में ही छिपा है। हमें यह समझना होगा कि अंततः मानवता की जीत ही सबके हित में है। यह जीत तभी संभव है जब प्रत्येक धर्म अपने भीतर छिपी अमानवीयता-विषमता, जातिवाद, छुआछूत; कट्टरता और अमानवीय प्रथाओं, परम्पराओं को निडर होकर पहचाने, उनसे मुक्ति पाए और सच्चे धार्मिक सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए। दुखद सत्य यह है कि आज यह आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य न हिंदू समाज में ठोस रूप ले पा रहा है, न इस्लाम में और न ही अन्य किसी में। जब तक सभी समुदाय आत्म-मंथन और आत्म सुधार की इस कठिन लेकिन अनिवार्य यात्रा पर नहीं निकलेंगे, तब तक सच्ची शांति और समता केवल सपना ही बना रहेगा।
(13.01.2026)


