बहुजन आंदोलन की राह हमेशा काँटों भरी रही है। कोई भी बड़ा सृजनात्मक और सकारात्मक बदलाव, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या राजनैतिक, तात्कालिक व्यवस्था के लोहे के शिकंजे को तोड़ने का प्रयास करता है तो उसे सबसे पहले उसी तात्कालिक व्यवस्था, उस आंदोलन के लाभार्थियों और तात्कालिक व्यवस्था के उन शोषितों का प्रतिरोध झेलना पड़ता है जो सदियों से उसी व्यवस्था के आदी हो चुके हैं। बसपा जैसे बहुजन आंदोलन के सामने भी यही कड़वी सच्चाई खड़ी है। यह आंदोलन तो उन करोड़ों दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के लिए लड़ रहा है जिन्हें सदियों से अपमान, शोषण और उपेक्षा का सामना करना पड़ा, पर सबसे बड़ी दीवार उनके सामने खुद उन्हीं शोषितों की बन जाती है। उच्च जातीय समाज की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर वही समाज, जिसके हित में यह आंदोलन खड़ा हुआ है, अपने ही आंदोलन का विरोध करने लगता है। यह विरोध इतना गहरा और सूक्ष्म होता है कि बाहर से दिखता नहीं, पर अंदर से आंदोलन की जड़ों को हिला देता है।
सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू यह है कि बसपा आंदोलन का सबसे तीखा विरोध उसी शोषित तबके से आता है जिसने इस आंदोलन से सबसे ज्यादा लाभ उठाया। जो लोग कल तक गाँव की गलियों में अपमान सहते थे, जिनके बच्चों को स्कूल में अलग बिठाया जाता था, जिनके पास न राजनीतिक आवाज़ थी न सामाजिक सम्मान, वे ही जब आंदोलन की बदौलत सरकारी नौकरियों में पहुँचते हैं, राजनीतिक पद संभालते हैं, आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करते हैं, तो अचानक अपना असली चेहरा बदल लेते हैं। वे उन उपलब्धियों को अपनी काबिलियत, अपनी मेरिट, अपने मेहनत और अपनी बुद्धिमत्ता का फल बताने लगते हैं। बसपा के संघर्ष, मान्यवर कांशीराम साहेब के सपनों और बहन मायावती जी की दूरदर्शिता को वे भूल जाते हैं। धीरे-धीरे वे तथाकथित उच्च जातीय सवर्णों के चमचे बन जाते हैं। अपने ही आंदोलन को कोसने लगते हैं, उसके प्रति व्यंग्य करने लगते हैं और अपने ही समाज को गुमराह करते हैं। यह चमचा वर्ग आंदोलन का सबसे खतरनाक दुश्मन बन जाता है क्योंकि यह दुश्मन बाहर से नहीं, अंदर से वार करता है।
इसीलिए बहुजन आंदोलन को एक साथ चार मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है—सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक। उसे न सिर्फ सवर्ण वर्चस्व की व्यवस्था से लड़ना होता है, बल्कि अपने ही समाज के भीतर पैदा हो चुकी इस चमचा मानसिकता से भी दो-दो हाथ करना पड़ता है। जब आंदोलन की गति किसी कारणवश मंद पड़ती है—चाहे आर्थिक संकट हो, संगठनात्मक कमजोरी हो या चुनावी हार—तो यही चमचा तबका सबसे पहले मैदान में कूदता है। वे आंदोलन को कोसने लगते हैं, सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार फैलाते हैं, पुराने साथियों को गाली देते हैं और नई पीढ़ी को यह भ्रम देते हैं कि बसपा का कोई भविष्य नहीं है। इस दुष्प्रचार का नुकसान सीधे आंदोलन को उठाना पड़ता है। वोट कम होते हैं, कार्यकर्ताओं का उत्साह घटता है और सपनों का सूरज फिर से धुंधला दिखने लगता है।
पर यहीं पर बहुजन आंदोलन के सच्चे सिपाहियों की असली परीक्षा होती है। जब चमचा वर्ग आंदोलन को पीठ में छुरा घोंपता है, तब सच्चे कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। उन्हें हर संभव तरीके से आंदोलन को गतिमान रखना होता है—नई पीढ़ी को सही इतिहास सिखाकर, गाँव-गाँव में जागृति अभियान चलाकर, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भावनात्मक जुड़ाव बनाकर और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर। उन्हें याद रखना चाहिए कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या एक पार्टी का नहीं है, यह हजारों वर्षों के शोषण के खिलाफ एक अमर संघर्ष है। जब तक चमचा मानसिकता पर प्रहार नहीं होगा, जब तक शोषित समाज अपने हितों को पहचानकर एकजुट नहीं होगा, तब तक बहुजन आंदोलन का सपना पूरा नहीं हो सकता।
इसलिए आज हर बहुजन को समझना होगा कि आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती बाहर नहीं, अंदर है। अगर हम अपने ही भ्रमित व चमचा बन चुके भाई-बहनों को फिर से आंदोलन की रोशनी की ओर ला सके, उन्हें चमचा संस्कृति से मुक्त कर सके और उन्हें याद दिला सके कि उनकी हर सफलता बहुजन आंदोलन एवं बसपा के रक्त और पसीने का नतीजा है, तो कोई ताकत इस आंदोलन को रोक नहीं सकती। यही एकमात्र रास्ता है जिससे बहुजन समाज न सिर्फ स्वाभिमान हासिल करेगा, बल्कि एक नई समतामूलक संस्कृति एवं सभ्यता का निर्माण भी करेगा—जहाँ जाति का जहर नहीं, समता का अमृत बहेगा। यह संघर्ष कठिन है, पर असंभव नहीं। बस हमें अपनी चेतना को जागृत रखना है और आंदोलन को हर हाल में गतिमान रखना है। क्योंकि यह आंदोलन सिर्फ बसपा का नहीं, यह पूरे भारत के राष्ट्रनिर्माण का अपना आंदोलन है—अपने अस्तित्व की लड़ाई है।


