एन दिलबाग सिंह का कॉलम: अम्बेड़कर कट्टरता विरोधी या हिंदू विरोधी

वैसे सबकी अपनी अपनी राय होती है, कोई जरूरी नही कि एक सही होने का मतलब दुसरा गलत हो जाता है. मैं ये मानता हुँ कि ये जरूरी नही कि आज के दलित आदिवासी युवओं के आदर्श अम्बेड़कर या काशीराम ही बने, आखिर उनको दसवी कक्षा तक भी पढ़ाया ही कितना जाता है और बाद में तो सिर्फ कला संकाय के अलावा पढ़ाया ही नही जाता. लेकिन, इसका मतलब ये नही है कि वो अम्बेड़कर या काशीराम विरोधी हो गए है.

जब भी कोई हिंदू त्यौहार आता है, कुछ लोग अम्बेड़करवादी होने को आधार मानकर या तो बौद्ध रीति से त्यौहार मनाने की अप्रत्यक्ष गुजारिश करते है या फिर दलित वर्गो के लोगों के लिए अनाप सनाप शब्दों का इस्तेमाल करने लगते है, जो कि कहीं से भी अम्बेड़करवाद नही है. अगर, पुजा को ही आधार मानना है तो अम्बेड़कर महाराष्ट्र से थे कितने फीसदी लोगों ने अम्बेड़कर को आज तक अपनाया है?

कांशीराम के गृह राज्य पंजाब मे कितने अम्बेड़करवादी पैदा हो पाये या फिर मायावती के गृह राज्य उतरप्रदेश मे कितने अम्बेड़करवादी पैदा हो पाये?

पाखण्ड़ों का पुरजोर विरोध करो लेकिन इसके लिए किसी को जबरदस्ती अम्बेड़कर विरोधी या अम्बेड़करवादी घोषित ना कीजिये. यूपी मे बहनजी की 4 बार सरकार बनी है, कितने लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ा, लगभग जीरो फीसदी लोगों ने, लेकिन उसके बावजूद भी लोग खुल कर जातिवाद और कुरीतियों का विरोध कर रहे है. लोगों को खुद से तोड़कर फैंकने का काम करके कौन से सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तन लाना चाह रहे हो.

समय और परिस्थितियाँ अम्बेड़कर और कांशीराम पैदा करती है, आज परिस्थितियाँ आपको सिर्फ जातिवादी मानसिकता और कुरीतियों के विरोध तक की इजाजत दे रही है, याद रखना आपको इससे आगे कुछ मिलना भी नही है. हर वर्ग धीरे-धीरे ही सही मगर जातिवाद की कट्टरता को कम कर रहा है, कुरीतियों और रीति रिवाजों को समय के हिसाब से बदल भी रहा है. आपको बता दुँ कि हिंदू धर्म मे फैली जातिवाद की नीचता एवम् कट्टरता के कारण अम्बेड़कर ने हिंदू धर्म छोड़ा था, हिंदुओं से नफरत के कारण नही छोड़ा था. अगर आज वो जिंदा होते और उनको धर्म के बारे मे फैंसला लेना होता तो मेरा मानना है कि वो धर्मविहीन समाज की वकालत करते.

बौद्ध धम्म लेने के उनके तात्कालिक, सामाजिक और राजनैतिक कारण हो सकते है वरना उन जैसा महान तार्किक और साइंटिफिक विचारों वाले आदमी को ना तो किसी राम के नाम की जरूरत थी और ना ही किसी बुद्ध के नाम की. बौद्ध होने का मतलब ये नही है कि वो अम्बेड़करवादी ही हो गया है और ना ही हिंदू धर्म मे आस्था होने का मतलब ये है कि वो अम्बेड़करविरोधी हो गया है. बाबा साहेब ने भी धर्म परिवर्तन अपने जिन्दगी के अंतिम वर्षो मे ही किया जबकि कुरीतियों, कट्टरता, पाखण्ड़ और जाति के नाम फैली नीचता का पूरी जिंदगी पुरजोर विरोध करते रहे थे.

पाखण्ड, आस्था, सामाजिकता, पारिवारिक माहौल और कट्टरता जैसे विषयों पर जो बारीक लाइन है, उस लाइन के महत्व की आपको तब भी कद्र करनी है जब आप हिंदू हो और तब भी करनी है जब आप हिंदू नही हो. कुछ लोग मंदिर में भी सिर झुकाते है और मस्जिद, चर्च बौद्ध मठ या गुरुद्वारे मे भी और कुछ लोग कट्टरतावश दूसरों के पूजा स्थलोंको तोड़ने मे भी हिचक नही करते – इस फर्क को समझना ही वास्तविकतावाद है, वही अम्बेड़करवाद है.

पाखण्ड़ों और कुरीतियों के विरोध के नाम पर सब कुछ जायज नही हो जाता है. मैं एक बागी हिंदू या नास्तिक होकर समझना चाहता हूँ कि अम्बेड़करवाद आपको किस लेवल और तार्किकता के साथ विरोध करने की छूट देता है, अम्बेड़करवाद आपको कट्टर नही तार्किक बनाने की राह दिखाता है. अम्बेड़कर से कट्टरता रखने वाले हिंदू तो आज भी इतना चिढ़ते है कि उनकी मूर्तियों को तोड़कर जश्न मना लेते है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह, यह लेखक के निजी विचार है)

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