बहुजन समाज पार्टी के मिशन में एक छोटी-सी बात बार-बार दोहराई जाती है, लेकिन उसका गहरा अर्थ बहुत कम लोग समझ पाते हैं। जो कार्यकर्ता या समर्थक मात्र पाँच रुपये का सहयोग देता है, वह अक्सर पाँच सौ ‘अनावश्यक’ सवाल पूछने लगता है। कभी पदाधिकारी पर पैसों के दुरुपयोग का आरोप लगाता है, कभी हिसाब माँगता है, कभी यह शिकायत करता है कि उसका पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। यह दृश्य हर लयकसभा क्षेत्र, हर विधानसभा क्षेत्र में देखने को मिलता है। लेकिन क्या, वास्तव में, यह समस्या पैसे की है? नहीं। समस्या ‘निर्भरता’ की है। जब कोई व्यक्ति खुद को आर्थिक रूप से आंदोलन का हिस्सा नहीं मानता, बल्कि केवल ‘दाता’ समझता है, तो वह स्वाभाविक रूप से ‘मालिक’ बनने का दावा करने लगता है।
याद कीजिए महाराष्ट्र की वह घटना। कई वर्ष पहले मान्यवर साहेब पर गंभीर आरोप लगाया गया। कहा गया कि वे सरकारी नौकरों के चंदे से इकट्ठा हुए पैसों का इस्तेमाल दूसरों के शराब के खर्चे पर कर रहे हैं। आरोप लगाने वाले वे ही सरकारी कर्मचारी थे, जिन्होंने पहले चंदा दिया था। जब उन्हें लगा कि उनका पैसा ‘दुरुपयोग’ हो रहा है, तो उन्होंने सहयोग देना बंद कर दिया। नतीजा? आंदोलन की गति थोड़ी मंद पड़ी, लेकिन मान्यवर साहेब ने कभी घबराकर जवाब नहीं माँगा। उन्होंने कहा था – “जो पैसा देता है, वह सवाल भी पूछेगा। जो खुद का समय, हुनर और पैसा लगाता है, वह सवाल नहीं पूछता, बल्कि साथ खड़ा होता है।”
इतिहास और अनुभव यही सिखाते हैं कि जब आंदोलन कार्यकर्ताओं के ‘अपने’ संसाधनों पर टिकता है, तब अनावश्यक सवालों की बौछार रुक जाती है और सकारात्मक सहयोग की बाढ़ आ जाती है। छोटा चंदा देना आसान है, लेकिन अपनी जेब से, अपने पसीने से, अपने हुनर से आंदोलन को खड़ा करना, आन्दोलन को अनवरत सहयोग करना कठिन है। यही कठिनाई ही विश्वास पैदा करती है।
मान्यवर साहेब ने इसी सोच को कार्यकर्ताओं के लिए जीवन-मंत्र बना दिया। उन्होंने तीन स्तंभों पर जोर दिया:
समय – हर कार्यकर्ता को आंदोलन के लिए अपना समय देना चाहिए।
हुनर – अपनी पढ़ाई, कौशल, अनुभव को बहुजन समाज की सेवा में लगाना चाहिए।
आर्थिक आत्मनिर्भरता – आंदोलन को किसी की दया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हर कार्यकर्ता व समर्थक को खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना चाहिए ताकि वह बिना किसी के सामने हाथ फैलाए आंदोलन चला सके।
वे कहते थे – “जब तक कार्यकर्ता खुद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक वह स्वतंत्र भी नहीं होगा।” उन्होंने खुद इसका उदाहरण दिया। उन्होंने कभी किसी बड़े उद्योगपति या राजनीतिक दल से चंदा नहीं माँगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सिखाया कि छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू करो, अपनी आय बढ़ाओ, बचत करो और उसी बचत से आंदोलन को मजबूत करो। परिणामस्वरूप बसपा के करोड़ों कार्यकर्ता आज भी बिना किसी दाता के सहारे आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं।
आज जब हम देखते हैं कि कुछ संगठन बड़े-बड़े चंदों पर निर्भर होकर चलते हैं, तो उनके कार्यकर्ता भी उसी अनुपात में ‘मालिकों’ के सामने सिर झुकाते नजर आते हैं। लेकिन बहुजन आंदोलन की खूबसूरती यही है कि यहाँ हर कार्यकर्ता स्वयं मालिक है। पाँच रुपये देने वाला सवाल पूछ सकता है, लेकिन जो अपना समय, हुनर और पैसा लगाता है, वह सवाल नहीं पूछता, बल्कि जवाब देता है – “यह मेरा आंदोलन है।”
इसलिए आज हर बहुजन कार्यकर्ता को मान्यवर साहेब के इस मंत्र को दोहराना चाहिए:
“समय दो, हुनर दो, और सबसे बढ़कर – आर्थिक आत्मनिर्भरता दो। तब देखना, अनावश्यक सवाल खत्म हो जाएँगे और सच्चा सहयोग, सच्चा विश्वास और सच्ची ताकत अपने आप पैदा हो जाएगी।”
बहुजन समाज की लड़ाई सिर्फ वोट और सीट की नहीं, आत्मसम्मान और स्वावलंबन की लड़ाई है। जब हर कार्यकर्ता खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगा, तभी यह आंदोलन असली मायने में अटल और अजेय बनेगा।


