8 मई मजदूर दिवस विशेष: अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर मजदूर एक मजबूर रचना

मज़दूर हुए मजबूर

मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं।
मज़दूर आज मजबूर हुआ
चुप बैठे रखवाले हैं॥

अव्यवस्था के शिकार हुए
लाखों गरीब मज़दूर यहाँ।
भूखे मरने को बीच राह में
लोग हज़ारों मजबूर यहाँ॥
मज़दूर के बच्चे बिलख रहे
कहाँ नसीब निवाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

मेहनतकश इंसानों को
मिलता पूरा दाम नहीं।
माल मलाई खाते हैं वो
करते हैं जो काम नहीं॥
कोई और ही दूध ले गये
ठगे गये ग्वाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

तन मिट्टी से सना हुआ
फिर भी नहीं भला हुआ।
क्षुधा शान्त कैसे होगी
चूल्हा भी नहीं जला हुआ॥
भीगा दामन भीगे गाल
आँसू के परनाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

जज़्बातों से खेलेने वाले
इनको करके बैठे गौण।
पाखण्डों का पोषण करते
लबों पे धरके बैठे मौन॥
जाकर किसे करें शिकायत
मज़दूर भोले-भाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

तन से पसीना बहाकर भी
ज़ुल्म-औ-सितम सहते हैं।
अन्याय अनीति होने पर भी
गूँगे-से बनकर रहते हैं॥
हिम्मत जवाब दे गयी
तभी तो हथियार डाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

ज़िम्मेदारी का बोझ ढोते
पड़े पाँवों में छाले हैं।
लम्बी अंधेरी राहों पर
खोए इनके उजाले हैं॥
अनजाना’ को दिखता दर्द
आँखों में नहीं जाले हैं।
मैं मुर्दों की बस्ती में हूँ
या ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं॥

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