मालवीय नगर की घटना, नस्लीय पूर्वाग्रह और जातिवादी सोच के संदर्भ में सामाजिक आत्ममंथन भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषा बदलती है तो बोली बदलती है, भोजन बदलता है तो पहनावा बदलता है, चेहरे बदलते हैं तो सांस्कृतिक रंग भी बदलते हैं। यही विविधता भारत की शक्ति है, उसकी पहचान है, उसका सौंदर्य है। किंतु जब यही विविधता संकीर्ण मानसिकता से टकराती है, तो “एकता” का आदर्श खोखला प्रतीत होने लगता है। 23 फरवरी 2026 को दक्षिण दिल्ली के Malviya Nagar में घटी घटना इसी विडंबना का उदाहरण बनकर सामने आई, जब Arunachal Pradesh से आई तीन महिलाओं को नस्लीय टिप्पणियों, अपमानजनक शब्दों और संदेहपूर्ण दृष्टि का सामना करना पड़ा। एक सामान्य विवाद ने जिस तरह उनकी पहचान को निशाना बनाया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि समस्या केवल व्यवहार की नहीं, सोच की है।
किसी को “चीनी” कहना, उसके खान-पान या चेहरे के आधार पर उसकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिह्न लगाना, या अपमानजनक रूढ़ियों से जोड़ देना, यह केवल असभ्यता नहीं, बल्कि नस्लीय भेदभाव है। यह वही मानसिकता है जो व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व, शिक्षा या योगदान से नहीं, बल्कि बाहरी बनावट से परिभाषित करती है। यही सोच किसी को “अपना” और किसी को “पराया” घोषित कर देती है। यह मानसिकता उतनी ही खतरनाक है जितनी जातिवादी सोच, जिसने सदियों तक भारतीय समाज को बाँटकर रखा।
भारत का सामाजिक इतिहास इस सच्चाई का साक्षी है कि जातिवाद ने समाज को भीतर से कमजोर किया। ऊँच-नीच की अवधारणा ने मनुष्यों को श्रेणियों में बाँट दिया, मानो जन्म ही योग्यता का निर्धारक हो। नस्लीय पूर्वाग्रह और जातिवाद दोनों की जड़ एक ही है। व्यक्ति को उसकी मानवीय गरिमा से वंचित करना। दोनों ही संविधान की भावना के विपरीत हैं।
इसी संदर्भ में राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब Dr. B. R. Ambedkar का चिंतन अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतंत्र के तीन स्तंभ बताया। विशेष रूप से “बंधुत्व” वह भावना जो हमें एक-दूसरे को अपना मानने की प्रेरणा देती है आज सबसे अधिक चुनौती के सामने है। यदि हम अपने ही देश के नागरिक को उसके रूप या जन्मस्थान के कारण अपमानित करते हैं, तो हम उस संविधान की आत्मा को आहत करते हैं, जिसकी रचना में राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब की केंद्रीय भूमिका थी।
पूर्वोत्तर भारत केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध है। Manipur, Nagaland, Mizoram, Meghalaya और Arunachal Pradesh जैसे राज्यों में सामुदायिक जीवन की मजबूत परंपरा है। स्वच्छता, अनुशासन, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक उत्तरदायित्व वहाँ के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। वहाँ के लोग आधुनिक भी हैं और अपनी जड़ों से जुड़े भी। उनकी मुस्कान में अपनापन है, व्यवहार में विनम्रता और जीवनशैली में संतुलन।
लेकिन यह प्रशंसा किसी और को नीचा दिखाने के लिए नहीं है। भारत के हर क्षेत्र में सजग, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक हैं। समस्या किसी भूगोल की नहीं, मानसिकता की है। जब तक हम अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को पहचानकर उन्हें चुनौती नहीं देंगे, तब तक भेदभाव नए रूपों में सामने आता रहेगा कभी जाति के नाम पर, कभी नस्ल के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर।
विडंबना यह भी है कि जब विदेशों में भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव होता है, तो हम उसे राष्ट्रीय अपमान कहते हैं। हम न्याय की माँग करते हैं, आक्रोश व्यक्त करते हैं, और एकजुटता की बात करते हैं। लेकिन जब अपने ही देश में किसी नागरिक के साथ उसकी पहचान के कारण अपमान होता है, तो वही संवेदनशीलता अक्सर मौन हो जाती है। यह दोहरा दृष्टिकोण हमारी नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर करता है। सच्चा राष्ट्रवाद केवल सीमाओं की रक्षा से सिद्ध नहीं होता; वह नागरिकों की गरिमा की रक्षा से सिद्ध होता है।
भारत की एकता केवल राजनीतिक सीमाओं से नहीं बनती; वह भावनात्मक स्वीकृति से बनती है। “एक भारत” का अर्थ यह नहीं कि सब एक जैसे दिखें, बोलें या खाएँ। उसका अर्थ यह है कि भिन्नताओं के बावजूद सम्मान समान रहे। सच्ची देशभक्ति तब सिद्ध होती है जब हम अपने से भिन्न व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करते हैं, न कि उसे संदेह या उपहास की दृष्टि से देखते हैं।
मालवीय नगर की घटना हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में उस लोकतांत्रिक आदर्श को जी रहे हैं, जिसका सपना हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था? क्या हम बंधुत्व को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रख रहे हैं, या उसे व्यवहार में भी उतार रहे हैं?
यदि हमें एक सशक्त और समावेशी समाज बनाना है, तो केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि शिक्षा, संवाद और संवेदनशीलता के माध्यम से मानसिक परिवर्तन लाया जाए। बच्चों को यह सिखाना होगा कि विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति है। युवाओं को यह समझाना होगा कि सम्मान किसी क्षेत्र विशेष का विशेषाधिकार नहीं, वह हर मनुष्य का अधिकार है।
सच्ची देशभक्ति यह नहीं कि हम केवल राष्ट्रगान गाएँ; सच्ची देशभक्ति यह है कि हम अपने से भिन्न व्यक्ति के अधिकार और सम्मान की रक्षा करें। यदि हमें एक सशक्त और समावेशी समाज बनाना है, तो कानून के साथ-साथ चेतना का परिवर्तन आवश्यक है। शिक्षा में संवेदनशीलता, संवाद में समानता और व्यवहार में बंधुत्व को स्थान देना होगा। जब तक हम अपने भीतर की संकीर्ण मानसिकता को पहचानकर उसे चुनौती नहीं देंगे, तब तक भेदभाव नए रूपों में लौटता रहेगा, कभी जाति के रूप में, कभी नस्ल के रूप में, कभी भाषा के रूप में।
अंततः प्रश्न यही है – क्या हम विविधता को स्वीकार करेंगे? या मानसिकता के संकीर्ण दायरे में सिमटते रहेंगे?
सम्मान एक मूल्य है।
समानता एक जिम्मेदारी है।
और बंधुत्व एक सतत अभ्यास।
जब ये तीनों हमारे व्यवहार में उतरेंगे, तभी हम सच में कह सकेंगे हम एक हैं, और सच में भारतीय।
(लेखक: दीपशिखा इन्द्रा, सोशल एक्टिविस्ट – ये लेखक के अपने विचार हैं)

