13.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

प्रोफेसर : ये शब्द अलंकार नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी है

प्रोफेसर: विद्वता का दायित्व और समतामूलक समाज का संवाहक

विश्वविद्यालयी विधा में प्रोफेसर, शोधार्थी और आधारभूत संरचना इसके मूल अंग हैं। इनके सामूहिक प्रयास किसी विश्वविद्यालय की ख्याति और पहचान को आकार देते हैं। इनमें प्रोफेसर शब्द सर्वोच्च अकादमिक पद का प्रतीक है, जो न केवल विद्वता का अलंकार है, बल्कि एक गहन जिम्मेदारी भी। प्रोफेसर अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ, शोधकर्ता, शोधार्थियों का मार्गदर्शक और विश्वविद्यालयी शिक्षा का शिखर होता है, जो स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर ज्ञान का संचरण करता है। यह पद विद्वता का परिचायक होने के साथ-साथ नैतिकता और सत्यनिष्ठा का भी द्योतक है, क्योंकि ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह मानव हित में प्रयुक्त हो। बिना नैतिकता के ज्ञान दुरुपयोग का साधन बन सकता है। अतः प्रोफेसर से अपेक्षा की जाती है कि वह ज्ञानवान होने के साथ-साथ नैतिक और सत्यनिष्ठ भी हो।

प्रोफेसर का कर्तव्य: ज्ञान का सृजन और प्रसार
प्रोफेसर किताबों, घटनाओं, सामाजिक परिस्थितियों और स्वतंत्र चिंतन के संनाद से ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को समृद्ध करता है। वह नवीन ज्ञान का उत्पादन करता है, उसका प्रचार-प्रसार करता है और ज्ञान के विकेंद्रीकरण के माध्यम से समाज के अंतिम पायदान तक उसे पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कार्य केवल अकादमिक दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता के व्यापक हित से जुड़ा है। किंतु आज समाज में ‘प्रोफेसर’ जैसे सम्मानित शब्द का प्रयोग गैर-जिम्मेदाराना ढंग से हो रहा है। विश्वविद्यालयी क्षेत्र में सहायक प्रोफेसर से प्रोफेसर बनने तक का सफर उच्च कोटि के शोध, शोध-निर्देशन और कम से कम 15 वर्षों के अनुभव की मांग करता है। फिर भी, कुछ लोग सामाजिक न्याय के नाम पर ‘ब्राह्मणवाद’ जैसे मुद्दों को उठाकर, जाति विशेष को निशाना बनाते हुए, यूट्यूब जैसे माध्यमों से स्वयं को प्रोफेसर के रूप में प्रचारित कर टीआरपी की दौड़ में शामिल हो रहे हैं। यह दुखद है कि भारत में इस उच्चतम अकादमिक पद को जिम्मेदारी से परे केवल अलंकार के रूप में लिया जा रहा है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि इसे महज जीविका का साधन समझ लिया गया है, जिसके चलते ऐसे लोग प्रोफेसर शब्द का दुरुपयोग कर रहे हैं। यह ज्ञान उत्पादन करने वाले प्रोफेसरों और विश्वविद्यालयों के साथ अन्याय है।

प्रो. विवेक कुमार: प्रोफेसर शब्द के मायने को चरितार्थ करते हुए
इस संदर्भ में सुविख्यात समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार प्रोफेसर शब्द के वास्तविक अर्थ और दायित्व को सरल किंतु गहन रूप से व्याख्यायित करते हैं। वे लिखते हैं, “यूनिवर्सिटी और कॉलेज के शिक्षकों का कर्तव्य है कि वे अपने विषय के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करें, ताकि वह चंद अभिजात्य वर्ग की पूंजी न बनकर जनसामान्य तक पहुँचे।” इसके लिए विश्वविद्यालय में पढ़ाना, शोधार्थियों के शोध-प्रबंधों का निर्देशन करना, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध-पत्र प्रकाशित करना, मानक प्रकाशकों के माध्यम से बिना स्वयं का व्यय किए ज्ञान को प्रसारित करना और विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कार्यों में योगदान देना आवश्यक है। यह सब तभी संभव है, जब प्रोफेसर अपने विषय के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध और समर्पित हो। प्रो. विवेक कुमार ने इन सभी मानदंडों को न केवल अपने अकादमिक जीवन में चरितार्थ किया, बल्कि विश्वविद्यालय के बाहर समाज में भी समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के संदेश को जन-जन तक पहुँचाया।

अकादमिक और सामाजिक दायित्व का संगम
प्रो. विवेक कुमार ने विश्वस्तरीय शोध-पत्रों के लेखन, शीर्ष पत्रिकाओं में प्रकाशन और देश-विदेश के सेमिनारों में अपने विषय की गहन प्रस्तुति के माध्यम से अकादमिक जगत में प्रोफेसर शब्द के मायने को साकार किया। उनकी प्रोफेशनल ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण ने एक आदर्श स्थापित किया है। साथ ही, बुद्ध, रैदास, फुले, आंबेडकर जैसे समतावादी महानायकों और उनके संघर्षों में उनकी गहरी आस्था, समतामूलक विचारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें समाज में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाया। वे विश्वविद्यालय कैंपस से बाहर भी विषमतावादी संस्कृति के बीच समता के संदेश को प्रसारित करने में संलग्न रहे। इस तरह, वे अकादमिक और सामाजिक दायित्वों के बीच एक सेतु बन गए।

बहुजन आंदोलन का स्तंभ
प्रो. विवेक कुमार आज भारत राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित बहुजन आंदोलन और युवाओं के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में उभरे हैं। उनकी विद्वता, नैतिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता उन्हें इस आंदोलन का एक सशक्त स्तंभ बनाती है। जहाँ एक ओर वे विश्वविद्यालयी क्षेत्र में ज्ञान के सृजन और प्रसार में योगदान दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बहुजन समाज को जागृत करने और उसे समतामूलक समाज की दिशा में ले जाने में सक्रिय हैं। उनका जीवन प्रोफेसर शब्द के वास्तविक अर्थ को परिभाषित करता है—एक ऐसा विद्वान जो ज्ञान को मानव हित में समर्पित करे और समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करे।

निष्कर्ष:
प्रोफेसर शब्द केवल एक पदवी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जो ज्ञान, नैतिकता और मानवता के प्रति समर्पण की मांग करता है। आज जब इस शब्द का दुरुपयोग हो रहा है, प्रो. विवेक कुमार जैसे विद्वान इसके वास्तविक मायने को जीवंत रखते हैं। उनका जीवन और कार्य न केवल अकादमिक जगत के लिए प्रेरणा है, बल्कि बहुजन आंदोलन के लिए भी एक मार्गदर्शक प्रकाश है। प्रोफेसर का पद विद्वता और समाज सेवा का संगम होना चाहिए, और प्रो. विवेक कुमार इसका जीवंत उदाहरण हैं।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


Buy Now LEF Book by Indra Saheb
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...