आखिर कैसी ये खुशहाली है, कैसी ये तैयारी है?
देखो-देखो हर तरफ छाई, कैसी ये खुशहाली हैं?
बच्चे, युवा, बूढ़े सब संग मिल, कर रहे कैसी ये तैयारी है?
घर की साफ़-सफाई एवं पुताई, नए कपड़े और मिठाई,
दिया-बाती, कलम किताबें, सबके घर पर क्यूँ है आई?
गली-गली मे बच्चों ने क्यूँ है ऐसी धूम मचाई?
मन हुए जा रहा व्याकुल अब जानने को,
आखिर कैसी ये खुशहाली है , कैसी ये तैयारी है?
कामों मे उलझें है सब, प्रश्नो के उत्तर कौन बताता।
पोते संग गुजर रहे थे गांव के राम बहादुर दादा (कुछ ही क्षण मे)।।
लगे बताने खुशियों का राज, सुन जिसे मन खुश हुआ मेरा भी आज।
बोले बेटा आज यहाँ है उत्सव, आज है 14 अक्टुबर, आज है दीक्षा दीप महोत्सव।
आज ही के दिन छप्पन में, बाबासाहेब ने ली थी बौद्ध धम्म की दीक्षा।
ये ऐतिहासिक घटना थी, जो बन गयी देश की सांस्कृतिक पूंजी का हिस्सा।
प्रेरणादायक है ये तिथि, देती मानवता की शिक्षा।
आज घर सजेंगे, गांव सजेगें, शहर होगा नीला।
बच्चों के कलरव की बारात सजेगी,
घर पर होगा धम्म ध्वजा और हाथ में होगा झण्डा नीला।।
मीठा होगा, फल होंगे , हर जगह दीपक होंगे।।
रसोई मे महकेगी खुशबू गुझिया खीर समोसा और मिठाई की।
होंगे गीत-संगीत, चर्चा-परिचर्चा बहुजन महापुरुषों के संघर्ष एवं लड़ाई की।।
बेटा शिक्षा का ये पर्व अनुठा, कलम-किताबों के उपहारों से होगा पूरा।।
समता, स्वतंत्रता बंधुत्वता और मानवता के स्तम्भ पर हमारा ये पर्व है निर्मित।
प्रकृति की सुंदरता चोटिल ना हो, पटाखे जलाना यहाँ है वर्जित।।
बेटा तुम भी आगे आओ, करो तैयारी साथ में।
नाचेंगे, झूमेंगे, खेलेंगे, हम सब बच्चों के साथ में।।
शीबू भी समझ गए, चीकू भी अब समझ गई हैं कि,
कैसी ये खुशहाली, कैसी ये तैयारी और कैसा है ये उत्सव।
चल रहे मनाने हम, धूम-धाम से दीक्षा दीप महोत्सव।।
(रचनाकार: शैलजाकांत इंद्रा, विधि छात्र, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ)

