एन दिलबाग सिंह का कॉलम: नफरत जाति से या आरक्षण से

बहुत से लोग जो खुद को ज्यादा ही समझदार और महाज्ञानी मानते हैं, उनका मानना है कि जातिवाद की नफरत आरक्षण के कारण से हैं. क्या ये समझदार और महाज्ञानी लोग बता सकते हैं कि 10 फीसदी EWS (Economic Weaker Section) आरक्षण के कारण वो सामान्य वर्ग की किन-किन जातियों से और कितनी नफरत करने लगे हैं या इसका कोई और जवाब ढूँढ़ रखा है? वैसे आपको बता दूँ कि EWS आरक्षण दलित आदिवासी और पिछड़े वर्गों के गरीबों को नही मिलता, ये सिर्फ सामान्य वर्ग में 8 लाख सालाना से कम वाले अभ्यर्थियों को ही मिल सकता है.

अगर सच में ही आरक्षण के कारण नफरत है तो आरक्षण के कारण बनने वाले विधायकों और सांसदों को तो जिताने के लिए भी ये लोग वोट नही करते होगें. लेकिन, ऐसा तो बिल्कुल भी नही दिखता. तुम्हारी नफरत आरक्षण से बने अधिकारियों के अधीन काम करने में भी कुछ खास तो नही दिखाई देती बल्कि साथ में खाना-पीना, हँसी मजाक और घरेलू छोटी-मोटी पार्टियों से लेकर ब्याह शादी में निमंत्रण तक भी दिये जाते हैं. फिर ये नफरत किससे है?

अगर, नफरत सिर्फ आरक्षण से होती तो कम पढ़े लिखे गरीब मजदुर क्यों मार खा रहे हैं, वो तो आरक्षण से नौकरी पाने के लिए कभी आवेदन तक भी नही करते हैं. क्या तुमको सच में ही नही पता कि आरक्षण की शुरूआत का कारण जातिवादी नीचता ही थी. क्योंकि, इसी जातिवादी नीचता के कारण कुछ वर्ग दलित आदिवासियों आदि के हिस्से हड़प जाते थे. इन वर्गों को प्रतिनिधित्व के नाम पर वो काम मिले जो कोई और करता ही नही था. जैसे झाड़ू मारना, साफ सफाई आदि. फिर असल में ये नफरत अटकी कहाँ है, आखिर क्यों ये जातिवाद खत्म नही हो पा रहा है?

असली बात तो ये है कि तुम्हारी नफरत झेलने के लिए दलित आदिवासी समाज का आदमी तो चाहिए लेकिन वो कमज़ोर भी होना चाहिये. इतना कमज़ोर कि तुम्हारी जाति की नफरत पर SC-ST Atrocity Act यानि उत्पीड़न कानून की धारा लगवा के कोर्ट में ना खड़ा कर सकता हो, पुलिस में शिकायत करने से भी डरता हो, जो सारी उम्र तुम्हारे ही इशारों पर वोट डालके तुमको अपना खुदा मान चुका हो, वो पलटकर तुम्हारे थप्पड़ का जवाब तुम्हारे मुँह पर थप्पड़ मारकर न देता हो. तुमको जुल्म ढ़ाने के लिए तुमको अपनी जैसी गंदी मानसिकता के और भी सवजातिय लोग चाहिए, इसलिये सारी जिन्दगी आरक्षण के नाम नफरत फैलाते रहे कि आरक्षण से 30 फीसदी वाला अफसर हो गया, 90% वाला चपरासी भी नही लगता आदि आदि.

जातिय घमण्ड में चूर ऐसे ही लोगों को फिर मारपीट करने में खुशी मिलती है, जाति देखकर मारपीट, बलात्कार जैसे अपराधों करके भी सीना फूलने लगता है. असलियत में दरिंदगी करने में दिल को सुकून मिलने लगता है, सही मायने में एक साइको वाली मानसिकता जाति विशेष की बनने लगती है.

केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ वर्गों में बुद्धि और मानसिकता सुधार प्रोग्राम चलाने की आज सख्त जरूरत है. ऐसी कुँठित मानसिकता को अगर सही मायनों में खत्म करना है तो कमज़ोर को ताकतवर बनना होगा, शिक्षित होना होगा, संगठित होकर अपनी बातें मजबूती से रखनी होगी, पुलिस और कोर्ट का सहारा लेना होगा, अपनी वोट से अपने हकों के लिए लड़ने वाली पार्टियों या लोगों को ज़िताना होगा. ये जो घमण्ड है, ये धर्म और राजशाही इतिहास के कारण है, समय आ गया है कि तुम भी अपनी वोट से अपनी मर्जी का राजा बनाओ, जो धर्म तुमको नीचे गिराये, तुम उस धर्म की नीचता का जी जान से विरोध करना शुरू करो, जब तुम नीचे गिरने से मना कर दोगे तब ये धर्म और जातियों का खोखला दंभ खुद ही नीचे गिर जायेगा.

लोकतंत्र में ज़िनका राजा है, उनपर अत्याचार करने की हिम्मत किसी में नही होती, अगर कोई कर भी लेता है तो उनका दमन भी कर ही दिया जाता है. अक्सर ऐसे क्रुर लोगों का भविष्य अंधकार में ही रहता है. दलित आदिवासी समाज की केकड़ा प्रवृति और किसी को उच्च मानकर अपनी वोट को उनके कहने से डालने का या उनको खुश करने के लिए उनके हिसाब से वोट डालने का ही नतीजा है कि राजा बनना तो बहुत दूर की बात, इनके लिए जीवन भर संघर्ष करने वाले बाबासाजब अम्बेड़कर और मान्यवर कांशीराम भी जीवन भर राजनीति के हाशिये में ही रहे. जातिवाद खत्म ना होने का एक सबसे बड़ा कारण खुद को मानसिक गुलामी से बाहर लाने की कोशिश ना करना भी है, ये गुलामी पढ़े लिखे और नौकरी पेशा लोगों में भी बहुत है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के निजी विचार हैं)

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