21.3 C
New Delhi
Sunday, March 1, 2026

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’: बहन मायावती जी का दर्शन

भारतीय राजनीति और समाज सुधार के इतिहास में कुछेक व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिन्होंने न केवल अपने ऐतिहासिक कार्यों एवं विचारों से समाज को नवीन दिशा दी, अपितु अपने सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर एक नया सामाजिक आदर्श स्थापित किया। बहन कुमारी मायावती जी (बहनजी) ऐसा ही एक दुर्लभ व्यक्तित्व हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का सिद्धांत आज केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक मानवतावादी दर्शन बन चुका है जिसे ‘सर्वजनवाद’ कहा जा सकता है। यह दर्शन बुद्ध, रैदास, कबीर, फुले, शाहू, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और मान्यवर साहेब आदि सहित सभी दलित-बहुजन संतों, गुरुओं के विचारों, संदेशों, संघर्षों एवं मानवतावादी उद्देश्यों का समावेश है। यह दर्शन मान्यवर साहेब के “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के मूल मंत्र का स्वाभाविक विस्तार है जो सम्पूर्ण मानव समाज को समतास्वतंत्रता तथा बंधुत्व के सूत्र में बांधने का प्रयास करता है। 

आज विश्व स्तर पर बहनजी द्वारा प्रतिपादित “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का यह सिद्धांत एक दर्शन के तौर पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वीकार्यता प्राप्त कर विश्व दर्शन में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा है। भारत में आयोजित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सम्मेलन-2026 के थीम हेतु इस सूत्र—“सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय”—का प्रयोग तथा कुछ समय पूर्व संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा अपने संबोधन में इस सिद्धांत का दृढ़तापूर्वक उल्लेख, इसकी वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। यह लेख बहनजी के इस दर्शन के उद्भव, विकास, विस्तार तथा वर्तमान प्रासंगिकता का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उद्भव

“सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का मूल स्रोत प्राचीन भारतीय बौद्ध दर्शन—भवतु सब्ब मंगलम—में और आधुनिक भारत में बाबासाहेब रचित भारतीय संविधान में निहित है, किंतु आधुनिक संदर्भ में यह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तथा बहनजी से जुड़ा है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ‘बुद्ध और उनका धम्म’ लिखकर मानवता को बंधुत्व के धागे से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया तो मान्यवर साहेब ने बौद्ध दर्शन के मूल सूत्र “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” को बहुजन आंदोलन का आधार बनाया था। यह सूत्र वंचित, शोषित तथा दलित समाज के उत्थान का प्रतीक है।

बहनजी ने बौद्ध दर्शन—भवतु सब्ब मंगलम; और बाबासाहेब रचित भारतीय संविधान से प्रेरणा लेकर मान्यवर साहेब के “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के इस सूत्र को आगे बढ़ाते हुए इसे “सर्वजन” के स्तर पर ले जाकर एक क्रांतिकारी विस्तार दिया—सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय। बहनजी ने अपनी सरकार बनने पर “सर्वजन” शब्द को अपनी शासन नीति का सैद्धांतिक आधार बनाया ताकि दलित समाज के साथ-साथ अन्य सभी वर्गों—चाहे वे किसी भी जाति, वर्ण या धर्म के हों—के कल्याण के सिद्धांत एवं आदर्श नीति को अपनी सरकार की नीतियों में स्पष्ट तौर पर शामिल किया जा सके। यह कोई राजनीतिक चाल नहीं थी, बल्कि एक गहन मानवतावादी दृष्टिकोण था जिसमें उन्होंने सिद्ध किया कि सच्चा कल्याण सम्पूर्ण समाज का कल्याण होना चाहिए जोकि समतामूलक समाज (भारत राष्ट्रनिर्माण) सृजित करके ही स्थापित किया जा एकता है।

बहुजन से सर्वजन तक – व्यवहार और सिद्धांत

यह स्पष्ट है कि “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” एक व्यवहारिक सिद्धांत है जो विषमतावादी सामाजिक व्यवस्था को समतामूलक व्यवस्था में बदलने का सबसे सशक्त माध्यम है, जबकि “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” एक व्यापक आदर्श सिद्धांत है जो समस्त मानवता के कल्याण को लक्ष्य बनाता है। यह बाबासाहेब के समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व के आदर्शों पर आधारित और मान्यवर साहेब के ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के व्यावहारिक सिद्धांत का विस्तार है, जिसमें जाति-वर्ण आदि गैर-बराबरी की सीमाओं से ऊपर उठकर सभी को समान व न्यायपूर्ण अवसर और सम्मान देने की सोच निहित है।

यह दर्शन ब्राह्मणवादी (मनुवादी) व्यवस्था व संस्कृति का प्रतिकार कर समतामूलक समाज सृजन का मानवतावादी दर्शन है, जिसकी जड़े बुद्ध के बौद्ध दर्शन में, रैदास के बेगमपुरा, बाबासाहेब के अम्बेडकरवाद, और मान्यवर साहेब के बहुजनवाद में निहित हैं। 

संक्षेप में कहें तो बुद्ध के बौद्ध दर्शन, रैदास के बेगमपुरा दर्शन, बाबासाहेब के आंबेडकर दर्शन, मान्यवर साहेब के बहुजन दर्शन और बहनजी के सर्वजन दर्शन के मूल तत्व—समता, स्वतंत्रता व बंधुत्व; मार्ग—सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति का आन्दोलन; एवं लक्ष्य—समतामूलक समाज सृजन; एक ही हैं। 

बहनजी का यह दर्शन सिद्ध करता है कि बहनजी ने पार्टीगत, जातिगत तथा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर मानवता को सर्वोपरि माना। यही कारण है कि भारत सरकार सहित अन्य लोग भी आज इस सूत्र को अपनाने लगे हैं। यह बहनजी की व्यापक स्वीकार्यता, महानता तथा उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

वर्तमान समय में वैश्विक स्वीकार्यता

आज का भारत जब तकनीकी, राजनीति, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में चहुँमुखी विकास की ओर अग्रसर है, तब “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का सिद्धांत हर क्षेत्र में भारत का मुख्य स्वर बनकर गूंज रहा है। भारत में आयोजित एआई सम्मेलन-2026 का थीम, इस सूत्र का होना, इसका एक जीवंत उदाहरण है। इसी प्रकार अमेरिका में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा इस सिद्धांत का उल्लेख भारत की उस मानवतावादी सोच को रेखांकित करता है जिसे बहनजी ने प्रतिपादित किया है।

राजनीति, शासन, शिक्षा, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था तथा तकनीक—सभी क्षेत्रों में यह सूत्र आज प्रासंगिक है। आज जब देश सांप्रदायिकता की आग में जल रहा है, तब बहनजी ने “सर्वधर्म हिताय, सर्वधर्म सुखाय” का एक और अमर मानवीय सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह सिद्धांत सिद्ध करता है कि सच्चा कल्याण जाति-वर्ण, धर्म-संप्रदाय आदि विषमतावादी दीवारों से परे होता है।

विचारधाराओं का समन्वय

बहनजी का सर्वजनवाद कोई एकाकी विचारधारा नहीं, बल्कि बहुजन आन्दोलन का आदर्श सिद्धांत है जो स्वयं ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’, जो बहुजन आन्दोलन का व्यावहारिक सिद्धांत, का विस्तार है। इसमें बुद्ध, कबीर, रैदास, ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहू महाराज, मान्यवर कांशीराम साहेब आदि तथा सर्वोपरि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों, संदेशों, संघर्षों व उनके उद्देश्यों का सुंदर समन्वय हुआ है। बुद्ध का ‘भवतु सब्ब मंगलम’, कबीर का निर्गुण, रैदास की समता की पुकार, फुले-शाहू की शिक्षा क्रांति, मान्यवर साहेब का बहुजनवाद तथा बाबासाहेब का ‘समता, स्वतंत्रता व बंधुत्व आधारित राष्टनिर्माण हेतु संघर्ष—ये सभी तत्व सर्वजनवाद में एकीकृत होकर एक नया मानवतावादी दर्शन बनाते हैं।

निष्कर्ष

बहनजी का सर्वजनवाद केवल एक राजनीतिक दर्शन नहीं, अपितु समस्त मानव समाज के लिए एक जीवन-मंत्र है। यह बाबासाहेब व मान्यवर साहेब के बहुजन आंदोलन को सर्वजन के स्तर पर ले जाकर भारत के राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विश्व स्तर पर इस समावेशी, समतावादी, मानवतावादी तथा प्रगतिशील सिद्धांत की स्वीकार्यता स्वाभाविक तौर पर सिर्फ बहुजन समाज ही नहीं बल्कि भारत देश के लिए गर्व एवं उल्लास का विषय है।

यह सिद्धांत सिद्ध करता है कि बहनजी न केवल एक नेता हैं, बल्कि एक दूरदर्शी विचारक हैं, एक दार्शनिक हैं, जिन्होंने अपने आदर्श परम पूज्य बाबासाहेब, लोकतंत्र के महानायक मान्यवर साहेब, तथागत बुद्ध, संत शिरोमणि गुरु रैदास, गुरु कबीर, फुले, शाहूजी, नारायणा गुरु आदि सभी समतावादी संतों, गुरुओं आदि की तरह ही जाति-वर्ण, धर्म तथा संकीर्णता की दीवारों को तोड़कर मानवता के व्यापक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। आने वाली पीढ़ियां जब भारतीय समाज के समतामूलक परिवर्तन का इतिहास लिखेंगी, तब बहनजी का सर्वजनवाद एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होगा।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


Buy Now LEF Book by Indra Saheb
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

बसपा की असली जीत—शोषितों का जगा मनोबल है

भारतीय राजनीति के विशाल मंच पर जहाँ पार्टियाँ सत्ता की चकाचौंध में रंग-बिरंगे नृत्य करती दिखती हैं, वहाँ कांग्रेस का वंशानुगत विरासतवाद, भाजपा का...

पराये धन के सहारे नहीं, बहुजन के सहारे चलती है बसपा – बहनजी का अटल स्वाभिमान

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसके संस्थापक-मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी तथा बहनजी द्वारा स्थापित बहुजन आंदोलन की मूल विचारधारा (आम्बेडकरवाद) आत्मनिर्भरता, मान-सम्मान, स्वाभिमान...

कौन सी BAMCEF? मान्यवर साहेब की असली – या ब्राह्मणवादी वित्त पोषित नकली?

आज बहुजन संगठनों की महामारी में, जब बहुजन समाज के कानों में 'बामसेफ' का नाम गूँजता है, तो हृदय में एक अनिवार्य प्रश्न उदित...

न बिकने वाला बहुजन: मान्यवर साहेब का अमर मंत्र, बसपा का अटल संकल्प

बहुजन आन्दोलन के महान प्रणेता, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब का वह उद्घोष आज भी बहुजन हृदय में गूँजता है—एक ऐसा संदेश जो न केवल...

‘समाज का कार्य, समाज के धन से ही हो सकता है, व्यक्तिगत से नहीं’ – बसपा आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का अमर सूत्र

बहुजन आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का मूल मन्त्र— "समाज का कार्य समाज के धन से ही सम्पन्न होता है, व्यक्तिगत से नहीं।" भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कुछ...

कठोर पत्थर, अमर संदेश: बहनजी का इतिहास-लेखन

जब इतिहास के पन्नों को मिटाने की साजिशें रची जाती हैं, तब पत्थर बोल उठते हैं। वे पत्थर जो न केवल कठोर होते हैं,...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...