संकल्प-दिवस विशेष: जब पेड़ के नीचे बैठकर फूट-फूटकर रोए थे बाबासाहेब

आज 23 सितम्बर संकल्प दिवस है. आज के दिन का भारत के इतिहास व बौद्धों के लिए विशेष महत्व है. घटना 23 सितम्बर 1917 की है. इस घटना का गवाह बड़ौदा के कमेटी बाग में मौजूद वट वृक्ष है. कम से कम डेढ़ सौ साल पुराना वह वट वृक्ष भारत की इस निर्णायक घटना का मूक गवाह है. यह घटना आज के वक्त मे इसलिए महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2017 में उस घटना के एक सौ एक वर्ष पूर्ण हो गये हैं.

बड़ौदा नरेश सर सयाजीराव गायकवाड़ ने एक प्रतिभाशाली, होनहार गरीब नौजवान को छात्रवृति देकर कानून व अर्थशास्त्र के अध्ययन करने हेतु लंदन भेज दिया. छात्रवृति के साथ अनुबंध यह था कि विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद युवक बड़ौदा रियासत को अपनी दस वर्ष की सेवाऐं देगा.

अध्ययन कर उच्च शिक्षा हासिल करने के उपरांत 28 वर्षीय वह युवक करार के मुताबिक अपनी सेवाऐं देने हेतु बड़ौदा नरेश के सम्मुख उपस्थित हुआ. बड़ौदा नरेश ने उस युवक को सैनिक सचिव के पद पर तत्काल नियुक्त कर लिया. एक सामान्य सी घटना आग की लपटों की तरह पूरी रियासत में फैल गयी. बस एक ही चर्चा चारों और थी कि बड़ौदा नरेश ने एक अछूत व्यक्ति को सैनिक सचिव बना दिया है.

विडम्बना यह थी कि इतने उच्च पद पर आसीन अधिकारी को भी मातहत कर्मचारी दूर से फाईल फेंककर देते. चपरासी पीने के लिए पानी भी नहीं देता. यहां तक की बड़ौदा नरेश के उस आदेश की भी अनदेखी कर दी गयी जिसमें कहा गया था कि इस उच्च अधिकारी के रहने की उचित व्यवस्था की जावे. दीवान उनकी मदद करने से स्पष्ट ही इन्कार कर चुका था. इस उपेक्षा और तिरस्कार के बाद अब उन्हें रहने व खाने की व्यवस्था खुद ही करनी थी. किसी हिंदू लॉज या धर्मशाला में उन्हें जगह नहीं मिली. आखिरकार वह एक पारसी धर्मशाला में असली नाम छुपाकर एवं पारसी नाम एदल सोराबजी बताकर दैनिक किराये पर रहने लगे. लोगों ने धर्मशाला में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. उन लोगों ने जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया व सामान बाहर फेंक दिया. बहुत निवेदन के बाद उस युवक को धर्मशाला खाली करने के लिए आठ घंटे की मोहलत दी गयी. चूंकि उस समय बड़ौदा नरेश मैसूर जाने की जल्दी में थे, अतः उस युवक को दीवान जी से मिलने की सलाह दी गयी लेकिन दीवान उदासीन बने रहे. विवश होकर उस युवक ने दुखी मन से बड़ौदा नरेश को अपना त्याग-पत्र सौंप दिया और रेल्वे स्टेशन पंहुचकर बम्बई जाने वाली ट्रेन का इंतजार करने लगा. ट्रेन चार-पांच घंटे विलम्ब से चल रही थी. अतः वह कमेटी बाग के वट वृक्ष के नीचे एकांत में बैठकर फूट-फूट कर रोया. रूदन सुनने वाला उस वृक्ष के अलावा कोई नहीं था.

“लाखों-लाख से योग्य, प्रतिभावान एवं सक्षम होकर भी वह उपेक्षित था. दोष केवल इतना था कि वह अछूत था. उसने सोचा कि मैं इतना उच्च शिक्षित हूं, विदेश में पढा हूं, तब भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है तो देश के करोड़ों अछूत लोगों के साथ क्या हो रहा होगा?”

वो तारीख थी 23 सितम्बर 1917 थी.

जब आंसू थमे तो उस युवक ने एक विराट संकल्प लिया कि;

अब मैं अपना पूरा जीवन इस देश से छुआछूत निवारण और समानता कायम़ करने के कार्य करने में लगाऊंगा तथा ऐसा न कर पाया तो स्वयं को गोली मार लूंगा.
बाबासाहेब
Tweet

यह एक साधारण संकल्प नहीं था बल्कि महान संकल्प था, न तो यह संकल्प साधारण था न ही इसको लेने वाला व्यक्ति खुद साधारण था.

बड़ौदा के कमेटी बाग के उस वट वृक्ष के नीचे असाधारण संकल्प लेने वाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि देश का महान सपूत व महान विभूति बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे. बाबासाहेब के इस संकल्प से उपजे संघर्ष ने भारत के करोड़ों लोगों के जीवन की दिशा बदल दी. कहा जाता है कि दीप राग से ज्योति जल उठती है, व बुझे दीपक में प्रकाश आ जाता है. बाबासाहेब का पूरा जीवन दीपरागमय रहा. उन्होंने सनातन, आडम्बरवादी सामाजिक और धार्मिक परम्पराओं के विरूद्ध संघर्ष किया व उत्पीड़ित लोगों को जीने का नया रास्ता दिखाया.

आज उसी सम्यक संकल्प के शताब्दी वर्ष में हम सब भी मिलकर संकल्प लें कि असमानता व अन्याय का हम समन्वित प्रतिरोध/प्रतिकार करेंगे.

आज संकल्प दिवस पर बाबासाहेब के विराट संकल्प को ह्रदय से सलाम करते हुए उस महामानव को कोटि-कोटि नमन!

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

बहुजन की ज्वलंत ज्योति: बहनजी का ओज, बसपा का अटल वैभव

जब जगतगुरु संत शिरोमणि गुरु रैदास की जयंती पर गुरु बाबा रैदास की प्रतिमा/चित्र के सम्मुख समाजवादी पार्टी, श्री अखिलेश यादव और इनके उद्दंड...

बहुजन मिशन के योद्धा की अनिवार्य त्रिवेणी: W = T₁ × T₂ × T₃

मिशन (बहुजन समाज पार्टी) के सच्चे कार्यकर्ता की पहचान एक सरल किंतु गहन सूत्र में निहित है—W = T₁ × T₂ × T₃। यह...

मनुवादी सत्ता-चक्र से मुक्ति का स्वर्णिम पथ: बसपा का सामाजिक क्रांति-आह्वान

भारत की राजनीति के विशाल अखाड़े में एक अद्भुत सत्य उभरकर सामने आया है। भाजपा का वोट-बैंक, जैसे कोई प्राचीन हिमालय, अटल और अविचल...

चमचा वर्ग: बहुजन आंदोलन का सबसे खतरनाक दुश्मन

बहुजन आंदोलन की राह हमेशा काँटों भरी रही है। कोई भी बड़ा सृजनात्मक और सकारात्मक बदलाव, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या राजनैतिक,...

संक्रमण काल: तरुणावस्था की अग्निपरीक्षा और बहुजन आंदोलन का अमर-उदय

जीवन एक नाट्यशाला है, जहाँ प्रत्येक पात्र को अपनी भूमिका निभाते हुए एक निश्चित 'संक्रमण काल' से गुजरना ही पड़ता है। यह काल न...

आर्थिक आत्मनिर्भरता: बहुजन आंदोलन की ताकत

बहुजन समाज पार्टी के मिशन में एक छोटी-सी बात बार-बार दोहराई जाती है, लेकिन उसका गहरा अर्थ बहुत कम लोग समझ पाते हैं। जो...

प्रश्नों की हत्या और ईश्वर का भ्रम

मानव-मन की सबसे गहन जिज्ञासा वह नहीं है जो तारों की दूरी मापती है, न ही वह जो समुद्र की गहराई को छूने की...

मान्यवर साहेब की अमर त्रयी: बहुजन समाज, बसपा और बहनजी

मान्यवर श्री कांशीराम साहेब भारतीय राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में एक ऐसे दार्शनिक के रूप में उभरे, जिन्होंने दबे-कुचले वर्गों को सशक्त...

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’: बहन मायावती जी का दर्शन

भारतीय राजनीति और समाज सुधार के इतिहास में कुछेक व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिन्होंने न केवल अपने ऐतिहासिक कार्यों एवं विचारों से समाज को...

विविधता बनाम मानसिकता: पूर्वोत्तर और राष्ट्रीय एकता की चुनौती

मालवीय नगर की घटना, नस्लीय पूर्वाग्रह और जातिवादी सोच के संदर्भ में सामाजिक आत्ममंथन भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषा बदलती है तो...

बसपा की असली जीत—शोषितों का जगा मनोबल है

भारतीय राजनीति के विशाल मंच पर जहाँ पार्टियाँ सत्ता की चकाचौंध में रंग-बिरंगे नृत्य करती दिखती हैं, वहाँ कांग्रेस का वंशानुगत विरासतवाद, भाजपा का...

पराये धन के सहारे नहीं, बहुजन के सहारे चलती है बसपा – बहनजी का अटल स्वाभिमान

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसके संस्थापक-मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी तथा बहनजी द्वारा स्थापित बहुजन आंदोलन की मूल विचारधारा (आम्बेडकरवाद) आत्मनिर्भरता, मान-सम्मान, स्वाभिमान...