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Sunday, February 8, 2026

दलित राजनीति में ओबीसी हैं फिर ओबीसी राजनीति से दलित गायब क्यों?

दलित एक शब्द है ,जिससे एक पहचान बनती है. यह पहचान जाति की पहचान नहीं है. यह पहचान समाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है. यह पहचान संविधान के कुछ प्रावधानों का मोहताज नहीं है, न ही यह कृत्रिम है, बल्कि यह स्वाभाविक समाजिक उत्पति है.

विडंबना यह बन गई है कि ओबीसी नाम की जाति वर्ण-व्यवस्था के चिंतन के प्रभाव में दलित समाज का मतलब एससी का प्रयाय बनाने की कोशिश करता है.

एक ओबीसी लेखक ने तो यहां तक प्रतिध्वनि पैदा करने की कोशिश की है कि दलित साहित्य एससी साहित्य का पर्याय बन गया है. बात सही भी है, अगर केवल एससी यानी एक शेड्यूल में सूचीबद्ध जातियां ही अपने दलितपन को पहचान, उसके संदर्भित साहित्य लिख रही है तो क्या गलत है, सवाल है कि ओबीसी जातियां दलित साहित्य क्यों नहीं लिख रही है?

उदाहरण के तौर पर दिलीप मंडल कलवार जाति से है. कलवार जाति कच्ची दारू बनाने का काम करता है. वह समाजिक रुप से उतना ही अपमानित और अछूत है, जितना एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति. तुलसीदास ने इसे अधम जाति कहा है. क्या दिलीप मंडल को इस तरह इस अपमान से संदर्भित दलित साहित्य नहीं लिखना चाहिए ?

ओबीसी वर्ग में समाजिक रुप से पिछड़ी जाति यानी समाज में वंचित, दमित और दलित जाति को ही शामिल किया गया है तो क्या उनका कर्तव्य नहीं बनता की वे दलित साहित्य लिखे? यह एससी वर्ग की जाति का कर्तव्य कब से निर्धारित हो गया कि वह जाति और जाति से उत्पन्न समाजिक दंश पर लिखे. दलित साहित्य तो सबको आमंत्रित करता है कि जाति और वर्ण के खिलाफ लिखे. यहां तक कि कायस्थ भी अपने जाति दंश को लिखे और ब्राह्मणों के महापातर भी.‌ वे क्यों नहीं लिखते?

एससी, एसटी और ओबीसी एक संवैधानिक विकास है. इन तीनों को संविधान में बैकवर्ड क्लास ही कहा गया है.‌ संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में इन बैकवर्ड क्लास के उन्नति के लिए समुचित उपाय का प्रवधान करने का विधान बाबासाहेब बना कर गए हैं.‌

बाबासाहेब एससी जाति में सूचीबद्ध जाति से आते थे. इसलिए उन्हें अपने दलितपन का अहसास था. दलित होना समाज में कितना कठिन अवस्था है, उन्हे पता था. इसलिए जो जातियां अनूसूची में नहीं शामिल थी उनके लिए भी प्रवधान कर गए.‌ ये जातियां दलितपन को जीने को अभिशप्त हैं लेकिन अपने दलितपन को स्वीकार नहीं कर पाती. जैसे, अनुसूचित जाति में शामिल जातियों की अंग्रेजों ने ही पहचान कर ली थी. उन्होने डिप्रेस्ड क्लास के रुप में चिंहित किया था. उनके साथ समाज में अछूतपन इतना तीखा था कि सात समुंदर पार से आए अंग्रेज ने केवल अपनी आंखो से देखा ही नहीं, बल्कि उसे महसूस किया और इसे एक धार्मिक कर्तव्य की तरह नहीं, समाजिक बुराई के रुप में चिंहित किया.

बाबासाहेब ने खुद इसी समाज में आने के कारण इसकी लड़ाई लड़ी और साथ-साथ में गैर अछूत जातियों व वर्गों को जाति और वर्ण के खिलाफ अगाह करते रहे. उन्होंने “हू वेर शूद्रा” लिखा . लेकिन, आजतक किसी ओबीसी की हिम्मत नहीं हुई की वह किताब पढ़े या उसपर शोध करे.‌

आज पढ़े-लिखें ओबीसी की हालत यह है कि वह सवाल करता है कि हम दलित हैं तो हम पर दलित एक्ट क्यों लागू होता है. भाई दलित एक्ट नाम की कोई चीज नहीं होती.‌ इसका पूरा नाम – एससी/एसटी एट्रोसिटीज प्रिवेंशन एक्ट है यानी अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून.‌ जब बाबासाहेब पारसी लॉज में ठहरे थे तो पारसियों ने उन्हें केवल अछूत जाति के होने पर वहां से भगा दिया था. पारसी धर्म हिंदू धर्म नहीं था. इसी तरह नाई उनका बाल नहीं बनाता था. यह भी एक अत्याचार है. नाई कोई उच्च जाति नहीं होती है.‌ कोई भी चाहे वह किसी धर्म या जाति का हो वह अछूतपन का अत्याचार कर सकता है. यह बात सिद्ध है.‌

समाज में इस तरह की प्रवृत्ति आज भी विद्यमान है. सवाल है कि ओबीसी के लोग जो खुद समाज में दलित और वंचित रहे हैं, इस कानून से छुटकारा क्यों पाना चाहते हैं?‌  इसके जगह अगर ओबीसी समाज में उनका वश चलता है तो समझाने की कोशिश क्यों नहीं करते कि इंसानियत का यहीं तकाजा है किसी को अछूत मत मानो और अगर दिल में किसी तरह का अछूत मानने का भाव भी रहता है तो यह पाप है.‌ अगर इस तरह का व्यवहार करेंगे तो जेल चले जाओगे. समाजिक परिवर्तन तो ऐसे आएगा.‌

अनुसूचित जाति ने सबसे पहले अपने को दलित माना और समस्त दलितों को अंगीकार करते हुए उसके लिए उपाय करने की कोशिश की.‌ इसका उदाहरण है:

बाबासाहेब ने न केवल डिप्रेस्ड क्लास की लड़ाई लड़ी, वक्त आने पर शिड्यूल्ड ट्राइब को उसी तरह का संवैधानिक सरंक्षण दिया जिस तरह का एससी समूह को उपलब्ध था. ओबीसी के लिए कमीशन का प्रवधान कर गए.
मान्यवर कांशीराम ने मंडल कमीशन लागू करने का आंदोलन चलाया और रामविलास पासवान ने उसके पक्ष में संसद में जोरदार वकालत की. उसे लागू करवाया.

यह तो सब कोई जानता है, जो लोग नहीं जानते हैं वह है कि बिहार में बैकवर्ड कमीशन कैसे बना और पिछड़ी जातियों को आरक्षण कैसे मिला?

1953 में काका कालेलकर आयोग बना था. 1955 में उसने रिपोर्ट दिया. लेकिन,  रिपोर्ट में उसने डिसेंट लगा दिया कि यह रिपोर्ट अव्यवहारिक है. इसे लागू नहीं किया जा सकता है. बिहार में 1971 में बिहार बैकवर्ड कमीशन बना.‌ इस कमीशन का गठन तत्कालीन मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री ने किया था.‌ इस सात सदस्यीय कमिटी का अध्यक्ष माननीय मुंगेरी लाल थे. उन्होंने अपनी रिपोर्ट जनवरी 1976 को सौंप दी थी. उसमें उन्होंने मोस्ट बैकवर्ड कास्ट (एमबीसी, जिसको नीतिश कुमार ने ईबीसी कहा – एक्स्ट्रिमली बैकवर्ड क्लास) 24 फीसदी आरक्षण का प्रवधान दिया था.

1976 जनवरी में जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री थे. उन्होंने उस कमीशन के आधार पर केवल पिछड़ा वित निगम बनाया.‌ जुलाई 1976 में कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने. नवंबर 1976 में उन्होंने मुंगेरी लाल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर दिया.‌ लागू करने के बाद एंटी रिजर्वेशन आंदोलन चले. इस एंटी रिजर्वेशन आंदोलन में कर्पूरी ठाकुर की सरकार चली गई.‌

लेकिन, इस एंटी रिजर्वेशन आंदोलन ने समाज के दो स्पष्ट विभाजन कर दिए. एक आरक्षण से प्रभावित समाज और एक आरक्षण ये लाभान्वित समाज. दोनों की टकराहट के बीच कई नेता पैदा हुए. उसमें लालू यादव और नीतिश कुमार प्रमुख हैं.‌ उन्होंने मुंगेरी लाल कमीशन से आगे कुछ नहीं किया. जो पिछड़े वर्ग के लिए किया और दिया है वह मुंगेरी लाल कमीशन का दिया हुआ है. मुंगेरी लाल कमीशन का गठन भोला पासवान शास्त्री ने किया था.

मुंगेरी लाल और भोला पासवान शास्त्री दोनों अनुसूचित जाति के दुसाध जाति से थे. दोनों को अपने दलितपन का अहसास था इसलिए समाज के पिछड़े वर्ग का उत्थान कर गए.

सवाल है इन ओबीसी नेताओं ने दलितों के लिए क्या किया? एक के राज में दलितों का नरसंहार हुआ और केस एवं इंक्वारी भी ढंग से नहीं हुई, सारे आरोपी छूट‌ गए, दूसरे ने अमीर दास आयोग खत्म कर दिया.

सवाल है कि दलित राजनीति में ओबीसी तो included है, ओबीसी राजनीति में दलित excluded क्यों हैं?

अब यहां बहुजन का ज्ञान मत पेलिएगा, बहुजन की अवधारणा मान्यवर कांशीराम की है और उनकी पार्टी बसपा (बहुजन समाज पार्टी) है और उस विचारधारा की स्वाभाविक संवाहक – जिसे आप सपोर्ट नहीं करते.

(लेखक: चांद मनीष; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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