दास्तान: मान्यवर कांशीराम और उनके बाप की पगड़ी

मैं पिता जी की जगह सिर पर पगड़ी क्यूँ बांधूं जब बाबासाहेब हमारे सारे समाज की पगड़ी मेरे सिर पर बांध गये है – साहेब कांशीरामजी

यह वाक्य अक्टूबर 1982 के पहले हफ्ते का है जब साहेब के पिता माननीय हरी सिंह का ‘भोग’ गाँव खवासपुर (नज़दीक जिला रोपड़) की सीमा के बाहर साहेब की उस प्रतिज्ञा (साहेब ने कसम ली थी कि वह अपने किसी सगे के मरने पर गाँव नहीं जायेंगे इसलिए यदि गाँव की सीमा के बाहर रखेंगे तभी आयेंगे) के मुताबिक गाँव खवासपुर की रेलवेपटरी को लांघकर यानि गाँव की रिहाईश के बाहर रखा था. भोग की रस्म अदा होने के बाद जब कुछ रिश्तेदार और पारिवारिक संबंधी पगड़ी की रस्म, जिसमें पिता की मौत के बाद सबसे बड़े बेटे के सिर पर पगड़ी बाँधी जाती है, निभाने लगे तो साहेब ने यह कहकर सिर पर पगड़ी बंधवाने से मना कर दिया कि यह आप जानो या आपका परिवार. मेरे सिर पर तो पहले ही बाबा साहेब ने पूरे समाज की ज़िम्मेदारी की पगड़ी बाँध दी है.

यह वह एतिहासिक क्षण था जब साहेब पूरे 27 साल बाद पारिवारिक सदस्यों से रूबरू हुए थे और इलाके के बुज़ुर्ग बड़ी गिनती में कांशीराम की एक झलक देखने के लिए पहुंचे हुए थे.

याद रहे 24 सितम्बर 1982 को साहेब ने जालंधर में पूना पैक्ट के मौके पर ‘धिक्कार दिवस’ का आयोजन किया था. साहेब की दो शर्तों के मुताबिक यानि न तो रैली का आयोजन बूटा मंडी में हो और न ही बूटा मंडी के किसी शख्स से रैली के लिए फंड ही लेना है. बूटा मंडी वालों को यह बताना है कि मिशन कैसे चलाये जाते हैं. साहेब का साफ़-साफ़ इशारा बूटा मंडी के कांग्रेसी पृष्ठभूमि के लोगों की तरफ था. इसलिए हुआ भी कुछ इसी तरह से. इसीलिए इस रैली का आयोजन बाबा स्किन फैक्ट्री के पास किया गया था.

इस रैली में 50 हज़ार से भी अधिक लोग शामिल हुए थे. यह वह रैली थी जिसने पंजाब की मौजूदा सियासत की जड़ों में तेल डालने का काम किया. साहेब के पिता इस रैली में गाँव के लोगों के साथ एक ट्रक में बैठकर गए थे. जब वह रैली में पहुंचे तो उन्हें भीतर से महसूस हुआ कि कितने खुशकिस्मत हैं कि उनके बेटे को 50 हज़ार से भी अधिक लोग सुनने के लिए पहुंचे हैं. उसी रात वापिस गाँव लौट आये. वह इतने खुश थे कि इसे सह नहीं पाए और उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई.

इधर साहेब अपनी प्रतिज्ञा के इतने पक्के थे कि जालंधर में मौजूद होने के बावजूद भी अपने पिता के आखिरी क्रिया क्रम में नहीं पहुंचे. साहेब अफ़सोस जताने भी घर नहीं पहुंचे. इसके पश्चात् माता बिशन कौर ने अपनी रिश्तेदारी में से कुछ लोगों को साहेब के पास चंडीगढ़ भेजा कि यदि संस्कार में नहीं आ पाए तो कम से कम मृत्यु के बाद की रस्म निभाने ही आ जाये! माता जी को डर था कि आखिर लोग क्या कहेंगे?

साहेब ने यहाँ भी दो शर्ते रखते हुए कहा कि मैं इन शर्तों के पूरा होने पर ही आ सकता हूँ.

पहली शर्त कि जिला रोपड़ का बामसेफ यूनिट मुझे निमंत्रण पत्र भेजे (ये परिवार के कहने पर नहीं आऊँगा) और दुसरी, अंतिम रस्म का स्मागम गाँव के बाहर रखा जाए.

साहेब की यह दोनों शर्तें मान ली गईं और तब वह अपने पिता सरदार हरी सिंह के अंतिम रस्मों पर पहुंचे थे. बोलने से पहले साहेब ने कुछ अंदर ही अंदर आह भरी लेकिन आंसू एक भी गिरने नहीं दिया. साहेब ने बोलना शुरू किया कि कुछ लोग मुझे पूछते हैं कि मैं पिता हरी सिंह के ‘भोग’ यानि अंतिम रस्मों पर क्यूँ नहीं पहुंचा जब कि मैं पंजाब में ही था. मेरा उनको जवाब है कि यदि मैं संस्कार पर आ भी जाता तो कौन सा पिता जी ने वापिस आ जाना था. अब तो यही है कि मेरे परिवार के लोग अपना ख्याल खुद रखें और जो कार्यकर्ताओं का फ़र्ज़ बनता है कि वह परिवार का ख्याल रखें. क्युंकी मैं तो त्याग के रास्ते पर चलके पूरे मुल्क का ख्याल रख रहा हूँ. मेरे परिवार जैसे लाखों परिवार और भी हैं जिनका मुझे ख्याल रखना पड़ रहा है. उन लाखों परिवारों की ज़िम्मेदारी मेरे सिर पर है. मेरे बिना उनको पूछने वाला भी कोई नहीं है. मिशन के इस काम के लिए मैं सिर पर कफ़न बांधकर निकला हुआ हूँ. जिसको मैं अपने जीते जी हर हाल में पूरा करके रहूँगा.

इस रस्म अदायगी के समागम में महज़ आधा घंटा शामिल होने के बाद साहेब पानी का घूँट भी पिए बिना अपनी अगली मंजिल की और रवाना हो गए. हालाँकि गाँव के लोगों और पारिवारिक सदस्यों ने साहेब को घर चलने की ताकीद की लेकिन वह अपनी धुन के पक्के ही इतने थे कि पारिवारिक सदस्यों के किसी भी निवेदन का उनपर कोई भी असर नहीं हुआ.

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