11.1 C
New Delhi
Saturday, January 17, 2026

जगजीवन राम: सामाजिक न्याय और राजनीतिक नेतृत्व की विरासत

जगजीवन राम, जिन्हें प्यार से “बाबूजी” के नाम से जाना जाता था, भारतीय राजनीति, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय आंदोलनों में एक प्रमुख व्यक्ति थे। 5 अप्रैल, 1908 को बिहार के चंदवा गांव में जन्मे, उन्होंने भारत के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बनने के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को पार किया। उनका राजनीतिक करियर चार दशकों से अधिक समय तक चला, जिससे वे भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने। विभिन्न मंत्री भूमिकाओं में उनके योगदान, विशेष रूप से श्रम कल्याण, कृषि और रक्षा में, ने भारत के शासन और विकास पर एक अमिट छाप छोड़ी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

दलित समुदाय में जन्मे, जगजीवन राम ने कम उम्र से ही जातिगत भेदभाव का अनुभव किया। सामाजिक बाधाओं का सामना करने के बावजूद, उन्होंने शिक्षाविदों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उन्होंने बी.एससी. की डिग्री हासिल की। ​​उनके छात्र वर्षों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ सक्रियता, सामाजिक समानता की मांग के लिए विरोध प्रदर्शन और सम्मेलन आयोजित करना शामिल था। सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके शुरुआती दिनों से ही स्पष्ट थी, क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

राजनीति में प्रवेश और सामाजिक न्याय में भूमिका

जगजीवन राम की राजनीतिक यात्रा 1930 के दशक में शुरू हुई जब उन्होंने 1935 में दलित अधिकारों और समानता की वकालत करते हुए अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की। वे 1937 में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए और उन्होंने ग्रामीण मजदूर आंदोलनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जनता से जुड़ने और उनकी चिंताओं को स्पष्ट करने की उनकी क्षमता ने उन्हें सामाजिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई में एक प्रमुख व्यक्ति बना दिया।

वे एक उत्साही राष्ट्रवादी थे और उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसके लिए उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। 1940 के दशक के दौरान, वे शासन में दलित प्रतिनिधित्व के लिए एक मजबूत आवाज के रूप में उभरे, उन्होंने निर्वाचित निकायों और सरकारी सेवाओं में आरक्षण की वकालत की।

कैबिनेट मंत्री के रूप में योगदान

1946 में, जगजीवन राम को जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया और बाद में वे स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य बने। अगले 30 वर्षों में, उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्रालयों में कार्य किया:

• श्रम मंत्री (1946-1952): प्रमुख श्रम कल्याण नीतियों की शुरुआत की।

• संचार मंत्री (1952-1956): भारत के डाक और दूरसंचार क्षेत्र को मजबूत किया।

• परिवहन और रेल मंत्री (1956-1962): रेलवे के बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण किया।

• खाद्य और कृषि मंत्री (1967-1970): भारत की हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की।

• रक्षा मंत्री (1970-1974, 1977-1979): 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत का नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ। राजनीतिक बदलाव और बाद के वर्ष हालांकि वे शुरू में इंदिरा गांधी के प्रति वफादार थे और आपातकाल (1975-77) का समर्थन किया, लेकिन बाद में वे कांग्रेस से अलग हो गए और 1977 में जनता पार्टी में शामिल हो गए। उन्होंने आपातकाल को समाप्त करने और भारत में लोकतंत्र को बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें जनता सरकार में उप प्रधानमंत्री (1977-1979) नियुक्त किया गया। अपने करियर के बाद के वर्षों में उन्होंने 1981 में कांग्रेस (जे) का गठन किया, लेकिन 6 जुलाई, 1986 को अपनी मृत्यु तक एक सम्मानित राजनीतिक व्यक्ति बने रहे। उनके पास लगातार 50 वर्षों तक भारतीय संसद के सदस्य होने का रिकॉर्ड है – एक अद्वितीय उपलब्धि। विरासत और मान्यता भारतीय राजनीति, सामाजिक न्याय और शासन में जगजीवन राम का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उनका स्मारक, समता स्थल, समानता के लिए उनके आजीवन संघर्ष का प्रतीक है। उनकी जयंती भारत में समता दिवस (समानता दिवस) के रूप में मनाई जाती है। बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय फाउंडेशन और शैक्षणिक संस्थानों सहित विभिन्न संस्थान उनकी विरासत का सम्मान करते हैं। सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास के प्रणेता होने के बावजूद, उन्हें अभी तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया है, जिसकी मांग विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों द्वारा लगातार उठाई जा रही है। जगजीवन राम का जीवन लचीलापन, नेतृत्व और सामाजिक न्याय के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का उदाहरण है। उनका योगदान भारत में समानता और लोकतांत्रिक शासन की वकालत करने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

(लेखक: लाला बौद्ध; ये लेखक के अपने विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...

ओपिनियन: दलित छात्रा की मौत और संस्थागत असंवेदनशीलता: एक सन्नाटा जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरता है

दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर एक बार फिर वह खामोशी गूंज उठी है, जो हर उस छात्र के दिल में बसी है, जो...

Opinion: समाजिक परिवर्तन के साहेब – मान्यवर कांशीराम

भारतीय समाज सहस्राब्दी से वर्ण व्यवस्था में बंटा है. लिखित इतिहास का कोई पन्ना उठा लें, आपको वर्ण मिल जायेगा. ‌चाहे वह वेद-पुराण हो...