10.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

जन्मदिन विशेष: सामाजिक परिर्वतन की महानायिका व ‘राष्ट्र गौरव’ बहनजी

समतावाद का संकल्प और बहनजी का योगदान

भारत में विषमतावादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समतामूलक समाज की स्थापना की परम्परा सहस्राब्दियों से संनादति रही है। देश के विविध प्रान्तों में अपने-अपने कालखण्ड में बहुजन समाज से उद्भूत संतों, गुरुओं, महानायकों और महानायिकाओं ने समतावादी आन्दोलन को अपने संघर्ष, विचार और मानवीय कर्मों से संनादित किया। इनके अध्ययन से यह स्पष्टं प्रतीति होती है कि इन सबका एकमात्र लक्ष्य समतामूलक समाज का सृजन रहा है। आदिकाल में जगद्गुरु तथागत बुद्ध और सम्राट अशोक महान्, मध्यकाल में संत शिरोमणि रैदास, कबीरदास जैसे महापुरुषों से प्रारम्भ यह आन्दोलन आधुनिक काल में क्रान्तिज्योति ज्योतिबा फुले, आरक्षण के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज और राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा समृद्ध हुआ।

प्रकाण्ड विद्वान् बाबासाहेब ने अपने संघर्ष और विद्वत्ता के बल पर बहुजन आन्दोलन को एक निर्णायक शिखर तक पहुँचाया। सामाजिक असमानता की व्याधि को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर उन्होंने संविधान में सर्वजन के अधिकार सुरक्षित किये, बौद्ध धम्म का मार्ग प्रशस्त कर इसका उपचार सुझाया और भारत के राष्ट्रनिर्माण का पथ प्रदर्शित किया। इसी कारण उन्हें “राष्ट्रनिर्माता” संज्ञा दी जाती है (स्रोत: आंबेडकर, संकलित रचनाएँ, खण्ड 1, 1936)। उनके महापरिनिर्वाण से उत्पन्न रिक्तता को लोकतन्त्र के महानायक मान्यवर कांशीराम ने पूर्ण किया। समय की आवश्यकता के अनुरूप संगठनों का निर्माण, सिद्धान्तों और सूत्रों का प्रतिपादन, और अनुशासित कार्यशैली के विकास द्वारा उन्होंने भारत के विखण्डित शोषित-वंचित समाज को एक सूत्र में संनादित कर ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न किया। बहनजी जैसी अप्रतिम प्रतिभा की खोज और उन्हें आन्दोलन से संनाद करना मान्यवर का अनुपम योगदान है।

बुद्ध-अम्बेडकरी पृष्ठभूमि में पलित-पुष्पित बहनजी ने प्रारम्भिक जीवन से ही बहुजन आन्दोलन से संनाद होकर अपने इतिहास, संस्कृति, नायकों-नायिकाओं के संघर्ष, शौर्यगाथाओं और विचारों का गहन अध्ययन किया। मान्यवर के साथ कदम-से-कदम मिलाकर ग्राम-गली और मुहल्लों में अम्बेडकरी विचारधारा का प्रचार-प्रसार कर उन्होंने इसे स्थापित करने का कालजयी कार्य सम्पन्न किया। उस युग में, जब वंचित पुरुष भी अपने द्वार पर सवर्णों के समक्ष चारपाई पर नहीं बैठ सकते थे, बहनजी ने एक नारी होकर मनुवाद और इसकी क्रूर व्यवस्था को खुली चुनौती दी। यह भारत के इतिहास का साहसपूर्ण अध्याय है।

संघर्ष की इस परम्परा में जब मान्यवर ने वंचित समाज को सत्ता के सिंहासन पर आसीन किया और बहनजी ने शासन की बागडोर सम्भाली, तब उन्होंने अपने पराक्रम से उत्तर प्रदेश—जो मनुवाद की जड़ कहलाता है—में ऐसी हुकूमत स्थापित की कि उनके शासन, प्रशासन और अनुशासन का लोहा विरोधी भी मानते हैं। यह गौरवशाली इतिहास भारत को सदा गर्वान्वित करेगा। बहनजी की कार्यशैली और ऐतिहासिक विकास कार्य सम्राट अशोक की स्मृति को जीवन्त करते हैं। निष्पक्ष इतिहासकार उन्हें “आधुनिक सम्राट अशोक” कहते हैं (स्रोत: प्रो. विवेक कुमार, 2015)। उनकी योग्यता और कर्मठता से प्रभावित तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उन्हें “लोकतन्त्र का चमत्कार” और वरिष्ठ पत्रकार जमील अख्तर ने “आयरन लेडी” संज्ञा दी।

बहनजी ने सामाजिक परिवर्तन के लिए निरन्तर कार्य किया। “बहुजन समाज और उसकी राजनीति” जैसा शोधग्रन्थ लिखकर उन्होंने इतिहास के उन पन्नों को स्वयं रचा, जिन्हें शोषकों ने कभी स्थान नहीं दिया। इस ग्रन्थ का विमोचन मान्यवर ने 14 अक्टूबर 2000 को किया। बहनजी ने इतिहास को कागजों तक सीमित न रखकर संगमरमर के शिलाओं पर भी अंकित किया, जो अशिक्षितों को भी भारत का गौरव सिखाता है। बाबासाहेब, मान्यवर और बहनजी राष्ट्रनिर्माण की ऐसी त्रयी हैं, जिन्हें पृथक् करना आन्दोलन को खण्डित करना है। जैसे स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व एक-दूसरे से अभिन्न हैं, वैसे ही बाबासाहेब का मार्ग, मान्यवर का संगठन और बहनजी का नेतृत्व एक हैं। यह त्रयी स्वतन्त्र भारत में राष्ट्रनिर्माण की सर्वोत्तम प्रतीक है।

मान्यवर के समकालीनों में बहनजी ही ऐसी थीं, जिन्होंने उनके सिद्धान्तों, सूत्रों और कार्यशैली को पूर्णतः आत्मसात् किया। इसीलिए मान्यवर ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण वर्ष के प्रथम मास की 15 तारीख को जन्मी बहनजी को आन्दोलन से जोड़ना मान्यवर का ऐतिहासिक निर्णय था। मण्डल आयोग को कार्यान्वित करने में उनकी सहभागिता और “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” की नीति ने जनमानस में उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखने की आकांक्षा जागृत की। यह भारत राष्ट्रनिर्माण में उनकी महती भूमिका को रेखांकित करता है।

आदिवासी, दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और न्यायप्रिय जन बहनजी के जन्मदिन को “जनकल्याणकारी दिवस” या “माया महोत्सव” के रूप में मनाते हैं। 21वीं शताब्दी के 21वें वर्ष से जनवरी मास को “माया माह” के रूप में उत्सव बनाकर उनके योगदान को जन-जन तक पहुँचाया जा रहा है। बहनजी का समर्पण, कार्यशैली और साहस उन्हें “भारत राष्ट्र गौरव” के रूप में स्थापित करते हैं। समतामूलक समाज और राष्ट्रनिर्माण के लिए उनका अतुलनीय योगदान भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।


स्रोत और संदर्भ :

  1. डॉ. बी.आर. आंबेडकर, “संविधान और समता,” संकलित रचनाएँ, खण्ड 1, 1936।
  2. मान्यवर कांशीराम, “संघर्ष से सत्ता,” बहुजन संगठक, 10 मई 1990।
  3. बहनजी, “बहुजन समाज और उसकी राजनीति,” विमोचन 14 अक्टूबर 2000।
  4. प्रो. विवेक कुमार, “आधुनिक सम्राट अशोक,” इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 2015।
  5. जमील अख्तर, “आयरन लेडी: मायावती,” 2008।

— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


Buy Now LEF Book by Indra Saheb
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...