जीवन एक नाट्यशाला है, जहाँ प्रत्येक पात्र को अपनी भूमिका निभाते हुए एक निश्चित ‘संक्रमण काल’ से गुजरना ही पड़ता है। यह काल न तो बाल्यावस्था की मासूमियत है, न प्रौढ़ावस्था की स्थिरता। यह वह रहस्यमयी अवस्था है, जहाँ पुराना खो जाता है और नया जन्म लेने को आतुर हो उठता है। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कोई बालक सीधे बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था में नहीं कूद सकता, वरन् तरुणावस्था की अग्नि-परीक्षा से होकर ही परिपक्वता प्राप्त करता है, उसी प्रकार कोई भी आंदोलन, कोई भी समाज अपने जीवन-चक्र में इस द्वंद्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजरने को विवश है। यह काल न तो शाप है, न अभिशाप। यह तो प्रकृति का विधान है—विकास का अनिवार्य सोपान।
कल्पना कीजिए एक कोमल बालक की। बाल्यावस्था में वह माँ की गोद में खिलखिलाता है, पिता की अँगुली पकड़कर चलना सीखता है। संसार उसके लिए खिलौनों का महल है। किंतु एक दिन, बिना किसी पूर्व सूचना के, उसकी देह में हार्मोनल तूफान उठता है। शरीर बदलता है, स्वर बदलता है, विचार बदलते हैं। करियर की चिंता, खेल-कूद की उन्माद, पहचान की खोज—ये सब मिलकर एक द्वंद्व का जाल बुन देते हैं। कभी वह विद्रोही हो उठता है, कभी आत्मसंशय में डूब जाता है, कभी सपनों के पंख लगाकर आकाश छूना चाहता है तो कभी भय से सिमटकर रह जाता है। माता-पिता की बात नहीं मानता तो भटक जाता है; उनके मार्गदर्शन स्वीकार करता है तो उस द्वंद्व से निकलकर स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर हो जाता है। तरुणावस्था यही तो है—विकास की वह कच्ची कुम्हार की चाक, जहाँ मिट्टी को आकार मिलता है, किंतु एक क्षण की असावधानी में बर्तन भी टूट सकता है।
इसी प्रकार, समाज और आंदोलन भी बालक की भाँति बढ़ते हैं। बहुजन आंदोलन—जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर समता का स्वप्न देखता है—आज ठीक उसी तरुणावस्था से गुजर रहा है। यह उसका संक्रमण काल है। एक ओर पुरानी पीढ़ी की स्मृतियाँ हैं, दूसरी ओर नई पीढ़ी की महत्वाकांक्षाएँ। एक ओर आंदोलन की मूल भावना—समानता, न्याय, सम्मान—दूसरी ओर आधुनिकता के नवीन आकर्षण, विरोधियों की चाल। कभी आंतरिक मतभेद, कभी बाहरी षड्यंत्र, कभी स्वयं की शक्तियों पर संदेह, कभी भविष्य के सुनहरे सपनों का उन्माद। यह द्वंद्व स्वाभाविक है। जिस प्रकार तरुण बालक को खेल-कूद और करियर के बीच चयन करना पड़ता है, उसी प्रकार बहुजन समाज को भी अपने आंदोलन की दिशा, रणनीति और नेतृत्व के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। यह काल न तो कमजोरी का प्रतीक है, न असफलता का। यह तो उस महान वृक्ष की जड़ों में छिपी शक्ति है, जो फूलने-फलने से पहले पत्तियाँ झाड़कर नई कलियाँ निकालता है।
किंतु प्रकृति ने इस द्वंद्व से पार पाने का एक सुंदर उपाय भी दिया है। बालक जब माता-पिता की वाणी को हृदयंगम करता है, उनके दिशा-निर्देशों पर चलता है, तब वह द्वंद्व को पार कर सफलता के शिखर पर आरूढ़ होता है। ठीक उसी प्रकार, बहुजन समाज को भी अपने माता-पिता स्वरूपा नेता—बहनजी—के मार्गदर्शन को अपनाना होगा। वे वह अमृत-वाणी हैं, जो सदियों के अनुभव को समेटे हुए हैं। वे वह दीपक हैं, जो अंधकार में राह दिखाती हैं। यदि बहुजन समाज उनकी बात को मानता है, उनके निर्देशों को आत्मसात करता है, तो यह संक्रमण काल मात्र एक सेतु बन जाएगा—पुरानी पीड़ा को पार कर नई आशा तक ले जाने वाला।
और जब यह संक्रमण काल सफलतापूर्वक पार हो जाएगा, तब क्या होगा? तब बहुजन समाज न केवल अपने आंदोलन की परिपक्वता प्राप्त कर लेगा, अपितु देश के कारोबार की बागडोर स्वयं अपने हाथों में लेगा। वह अपनी एजेंडा के अनुरूप शासन चलाेगा—न कि किसी की दया पर निर्भर। समतामूलक समाज की रचना करेगा, जहाँ जन्म की ऊँच-नीच नहीं, समता, स्वतंत्रता व बंधुत्व की महत्ता होगी। जहाँ हर वंचित को शिक्षा, रोजगार और सम्मान का अधिकार मिलेगा। और इस प्रक्रिया में वह भारत राष्ट्र-निर्माण का सबसे बड़ा स्तंभ बनेगा—वह भारत, जो बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के स्वप्नों को साकार करेगा; वह भारत, जो समता, बंधुत्व और न्याय की मूर्ति बनेगा।
इसलिए बहुजन आन्दोलन की इस तरुणावस्था को शाप मत समझिए। धैर्यवान बनिए। इसे द्वंद्व मत समझिए, इसे विकास की पुकार समझिए। आन्दोलन का एक पड़ाव समझिए। बहनजी की वाणी को सुनिए, उनके में आस्था बनाए रखिए और उस महान यात्रा पर सतत चलते रहिए, जहाँ संक्रमण काल का अंत होगा और अमरता का आरंभ। क्योंकि जिस प्रकार तरुण बालक माता-पिता के निर्देश स्वरुप मिले आशीर्वाद से सफल बनता है, उसी प्रकार बहुजन आंदोलन भी बहनजी के मार्गदर्शन से न केवल स्वयं को बचाएगा, अपितु समग्र भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा।
यह संक्रमण काल अस्थायी है, किंतु इसका फल चिरस्थायी होगा। यह काल द्वंद्व का है, किंतु इसका परिणाम समता का होगा। यह काल बहुजन का है, किंतु इसका गौरव समूचे भारत राष्ट्र का होगा।


