जातिवादी व व्यापारी मीडिया के दुष्चक्र में बहुजन

मीडिया का व्यापार और बहुजन समाज का भटकाव

पहले जब मीडिया खबरें देता था, तो यह व्यवसाय कहलाता था, किंतु आज यह खबरें बनाता है और व्यापार बन गया है—चाहे वह मनु मीडिया हो या तथाकथित बहुजन चैनल। लोग अब स्वतंत्र चिंतन और मंथन से अपना दृष्टिकोण निर्धारित नहीं करते। इसके बजाय, घर में बैठा व्यापारी पत्रकार अपनी टीआरपी और मुनाफे के लिए आपको अपने एजेंडे के अनुरूप सोचने को विवश करता है। आप वही सोचते हैं जो वह चाहता है, और वह वही चाहता है जो पूँजीवादी शक्तियाँ उसे निर्देशित करती हैं। इसके बाद पूँजीपतियों द्वारा संचालित मनु दल आपके मन को अपनी रणनीति के अनुसार ध्रुवीकृत करते हैं। जनता उनके इशारे पर सोचती और मतदान करती है। जो स्वयं का नजरिया तक नहीं बना सकते, वे अपनी समझ से मतदान कैसे करेंगे?

ऐसी परिस्थितियों में जनता सरकार नहीं चुनती, बल्कि मनु दल उसे इस तरह फँसाते हैं कि वह अनजाने में उनकी सरकार बना देती है। बाद में पछतावा शुरू होता है, और जब कुछ समझ न आए, तो सारा दोष बसपा पर मढ़ दिया जाता है। पिछले कुछ चुनावों से यही देखने और सुनने को मिल रहा है। अब यह तय करना कि चुनाव में किसे आगे करना है और किसे किनारे लगाना है, घर में कैमरे के सामने बैठा व्यापारी पत्रकार तय करता है। समाज उसके अनुसार सोचता और कार्य करता है। यही कारण है कि बाबासाहेब ने मीडिया को “व्यापार” और मान्यवर कांशीराम ने इसे “मनी, मीडिया, माफिया” कहकर इसकी कुटिल मंशा को चिह्नित किया था (स्रोत: बहुजन संगठक, 10 मई 1990)। प्रश्न यह है: क्या बहुजन समाज इसे पहचान पाया? और यदि पहचान भी लिया, तो क्या इसके चंगुल से मुक्त हो सका?

मीडिया के इस व्यापारी चरित्र को देखते हुए कुछ लोग पूछते हैं: यदि भाजपा, कांग्रेस, सपा, आप, टीएमसी, राजद, जदयू जैसे दल टीवी चैनलों को खरीद सकते हैं, तो बसपा ऐसा क्यों नहीं करती? इस संदर्भ में समझना आवश्यक है कि टीवी चैनलों की खरीद-फरोख्त अनैतिक, अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है। यह लोकतंत्र के लिए घातक है। बसपा, जो एक आंदोलन है, ऐसा अनैतिक कृत्य कदापि नहीं कर सकती। दूसरा, टीवी चैनल संचालक अपनी जाति (तथाकथित उच्च जाति) के प्रति निष्ठावान हैं। वे अपने सामंती व्यवस्था के खिलाफ नहीं जाएँगे, क्योंकि उनकी भ्रष्टाचार जातिवादी है, न कि केवल नैतिक पतन का परिणाम। वे बहुजन यूट्यूबर्स या अखबारों की तरह अपनी जाति के खिलाफ जाकर नहीं बिकते। तीसरा, चैनलों को खरीदने के लिए धनाढ्यों का सहारा लेना पड़ेगा। यदि धनाढ्यों का सहारा लिया, तो नीतियाँ गरीब, शोषित और वंचितों के लिए नहीं, बल्कि धनाढ्यों के हित में बनेंगी, जो संविधान और बसपा के लक्ष्य के विरुद्ध है। बसपा सीमित संसाधनों वाली शोषित-वंचितों की पार्टी है, जो अपनी वैचारिकी और सिद्धांतों पर अडिग है। धनाढ्यों का सहारा लेना उनके इशारों पर चलने को बाध्य करेगा, जो बहुजन आंदोलन के मूल्यों के खिलाफ है। अतः बसपा से ऐसी अपेक्षा करना नासमझी होगी।

तथाकथित बहुजन यूट्यूबर्स और पत्रकारों के संदर्भ में भी यही प्रश्न उठता है: यदि अन्य दल इन्हें खरीद सकते हैं, तो बसपा क्यों नहीं? किंतु भाजपा, कांग्रेस, सपा, आप, टीएमसी, राजद, जदयू आदि पूँजीवादी दलों की तरह पूँजीपतियों पर निर्भर हैं। बहुजन यूट्यूबर्स बाबासाहेब और मान्यवर के मिशन का दावा करते हैं। यदि वे स्वयं को इस आंदोलन का हिस्सा मानते हैं, तो उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे बसपा की आवाज को जन-जन तक पहुँचाएँ। दूसरी बात, ये यूट्यूबर्स बहुजन समाज से उत्पन्न हुए हैं। वे चमचे बन गए हों, पर अपने हैं। सामान्यतः अपनों को खरीदा नहीं जाता, बल्कि उन्हें अपनत्व से जोड़ा जाता है। यदि फिर भी वे गैरों के हाथ बिक जाएँ, तो यह उनकी अपनी कमजोरी है। मान्यवर ने ऐसे लोगों को “चमचा” कहा था (स्रोत: बहुजन संगठक, 15 अगस्त 1992)। ये चैनल भी व्यवसाय नहीं, व्यापार कर रहे हैं। इन्हें अनसब्सक्राइब करना या इनसे सावधान रहना ही श्रेयस्कर है।

मीडिया माहौल बनाता भी है और बिगाड़ता भी है। खाली कुर्सियों को जनसैलाब, कातिल को मुंसिफ और शोषित को शोषक बना देता है। यह काम केवल मनु मीडिया ही नहीं, बल्कि चमचों के यूट्यूब चैनल भी करते हैं। बहुजन समाज को स्वयं से पूछना चाहिए: 1984 से आज तक किसी मीडिया ने बसपा के पक्ष में माहौल क्यों नहीं बनाया? क्या बसपा का प्रभाव कभी रहा ही नहीं? यदि मनु मीडिया बसपा के खिलाफ है, तो तथाकथित बहुजन मीडिया उसके सकारात्मक कार्यों को जनता तक क्यों नहीं पहुँचा पाया? यह प्रश्न आपको यह सोचने पर विवश करेगा कि ये यूट्यूबर्स किसके हाथों बिके हैं। इस प्रश्न का उत्तर ही आपका मार्गदर्शन करेगा।

अंततः, बहुजन समाज को समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण और अपनी राजनैतिक अस्मिता के लिए उसे “एक दल, एक नेता, एक विचारधारा, एक झंडा, एक निशान” के सिद्धांत को अपनाना होगा। हमारी लड़ाई सकारात्मक है। हमें किसी को सत्ता से हटाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को सत्ता में स्थापित करने के लिए मतदान करना, सोचना, लिखना, बोलना और प्रचार करना चाहिए। दुखद है कि बहुजन समाज अपनी सत्ता स्थापित करने के बजाय भाजपा, कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों की खिलाफत में अपनी ऊर्जा, समय और संसाधन नष्ट कर रहा है। यह समाज अपनी वैचारिकी, सिद्धांत, सूत्र और कार्यशैली से जुड़ने के बजाय मनोरंजन और उन्माद में लिप्त हो गया है। दूसरों की रेखा मिटाना इसे आंदोलन लगता है, जबकि अपनी रेखा गहरी करने की बात भूल गया। यदि यह भटकाव न सुधरा, तो यह उसकी अस्मिता को खंडित करेगा और भविष्य में अत्याचारों का कारण बनेगा।

तथाकथित बहुजन यूट्यूबर्स को हितैषी मानने वालों को यह जाँचना चाहिए कि इन्होंने कितनी बार बसपा की कार्यशैली, कार्य और लोकतंत्र में योगदान को उजागर किया? इसका उत्तर आपकी अंधी आँखों को प्रकाश दे सकता है। बहुजन समाज को बसपा के नेतृत्व में संगठित होकर सत्ता की ओर अग्रसर होना होगा, तभी समतामूलक समाज का स्वप्न साकार होगा।


स्रोत और संदर्भ :

  1. मान्यवर कांशीराम, “मनी, मीडिया, माफिया,” बहुजन संगठक, 10 मई 1990, अंक 5, वर्ष 8।
  2. “चमचा की परिभाषा,” बहुजन संगठक, 15 अगस्त 1992, अंक 12, वर्ष 10।
  3. डॉ. बी.आर. आंबेडकर, “मीडिया और लोकतंत्र,” संकलित रचनाएँ, खंड 1, 1936।
  4. प्रो. विवेक कुमार, “मीडिया का प्रभाव,” इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 2015।
  5. “चुनाव और ध्रुवीकरण,” द हिंदू, 20 मई 2019।

— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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