बसपा का सत्ता समीकरण और चमचों का विरोध

मनुवादी दलों से समझौता करने के बजाए सीधे जनता के साथ यदि समीकरण तय करके बहुजन समाज सत्ता पर काबिज होने की रणनीति तैयार कर रहा है तो लोगों को तकलीफ़ क्यों है?

“सत्ता और जागरूकता: बहुजन आंदोलन की दोहरी राह”

बहुजन समाज के कुछ स्वयंभू चमचे यह प्रलाप कर रहे हैं कि पहले बहुजन को संगठित और मजबूत किया जाए, फिर सत्ता पर कब्जे की बात सोची जाए। हमारे विचार से यह कथन न केवल बहुजन समाज को गुमराह करने वाला है, बल्कि इसे उसके मूल मिशन से भटकाने का एक कपटपूर्ण प्रयास भी है।

बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एकता का सूत्र प्रदान किया, जिसे मान्यवर कांशीराम साहेब और बहनजी ने अपने अथक परिश्रम से बहुजन समाज को एक सूत्र में पिरोने का संकल्प लिया। किंतु दुखद यह है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जैसे समुदाय गांधी और शंकराचार्य के चरणों में लीन होकर अपनी पहचान को विस्मृत कर रहे हैं। यदि हम पहले इनको एकत्र करने का स्वप्न देखें और फिर सत्ता की बात करें, तो यह यात्रा अंतहीन हो जाएगी और सब कुछ राख में मिल जाएगा। सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक सत्ता के समीकरण एक साथ चलने चाहिए, एक-दूसरे के पूरक बनकर।

यही वह दूरदर्शिता थी, जिसके बल पर मान्यवर साहेब ने तीन बार कांग्रेस, कम्युनिस्ट, लोकदल और अन्य दलों के बिना शर्त समर्थन को स्वीकार कर सरकार का गठन किया। इस निर्णय से बहुजन समाज को क्या हानि हुई? बसपा के आलोचक इसे स्पष्ट करें! क्या यह सत्ता की भागीदारी बहुजन समाज के उत्थान का मार्ग नहीं बनी? फिर भी, जब बसपा राजनीतिक रूप से सीटें नहीं जीत पाती—हालांकि उसका मत प्रतिशत लगभग स्थिर रहता है—तो लोग व्याकुल हो उठते हैं। वे कहते हैं, “बहनजी कुछ नहीं कर रही हैं, बसपा मजबूत नहीं है।” और जब बहनजी सत्ता के समीकरण रचती हैं, तब भी लोगों को पीड़ा होती है। यह दोहरा मापदंड क्या दर्शाता है? आखिर कब तक यह गुलामी का जीवन जिया जाएगा?

मनुवादी दलों के साथ समझौते की बजाय, यदि बहुजन समाज सीधे जनता के साथ समीकरण तय कर सत्ता पर कब्जे की रणनीति रच रहा है, तो इसमें आपत्ति क्यों? क्या आत्मनिर्भरता का यह मार्ग इतना कष्टप्रद है कि लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाते? बहुजन समाज में जन्मे चमचों, तुममें बुद्ध, फुले, शाहू और अम्बेडकरी आंदोलन के वाहक—मान्यवर साहेब और बहनजी—के प्रयासों से सामाजिक जागरूकता तो जागृत हुई है, किंतु राजनीतिक समझ कब विकसित होगी? या फिर तुमने अज्ञानता में डूबे रहने और बसपा को बदनाम करने की शपथ ले रखी है?

एक दुखद सत्य यह भी है कि बसपा के प्रति यह विरोध और आलोचना करने वाले कोई और नहीं, वही लोग हैं जिनकी पुरानी पीढ़ियों ने बाबासाहेब का नाम लेकर मान्यवर साहेब का विरोध किया था। आज उनकी संतानें मान्यवर साहेब का नाम लेकर बहनजी के विरुद्ध खड़ी हैं। यह एक ऐतिहासिक चक्र है, जो बार-बार स्वयं को दोहराता है। किंतु हमें यह स्मरण रखना होगा कि बसपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। बहनजी ने स्वयं कहा है, “बीएसपी राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ एक मूवमेंट भी है।” (बहुजन संगठक, अंक: 28, वर्ष-24, 1 से 7 नवंबर 2004)। इस आंदोलन में कार्य करने वालों और इसके विरोधियों, दोनों को इस मूल तत्त्व को हृदयंगम करना होगा।

सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि बहुजन समाज को अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना है, तो उसे इन दोनों को साथ-साथ लेकर चलना होगा। केवल एकत्र होने का स्वप्न देखना और सत्ता को विलंबित करना आत्मघाती होगा। बसपा का इतिहास साक्षी है कि सत्ता की भागीदारी ही सामाजिक परिवर्तन का आधार बनती है। जब मान्यवर साहेब ने सत्ता स्वीकारी, तो उन्होंने बहुजन समाज को सम्मान और शक्ति दी। आज बहनजी उसी पथ पर अग्रसर हैं। फिर यह नकारात्मकता क्यों? यह चमचागिरी क्यों?

बहुजन समाज को चाहिए कि वह इन चमचों के मायाजाल से मुक्त हो, अपनी राजनीतिक चेतना को जागृत करे और बसपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो। यह आंदोलन तब तक जीवित रहेगा, जब तक हम इसके मूल उद्देश्य को समझेंगे और इसे सशक्त करेंगे। सत्ता और जागरूकता का यह संतुलन ही फुले, शाहू और बाबासाहेब के सपनों को साकार करेगा। समय है सजग होने का, आत्मनिर्भर बनने का और उस गुलामी के बंधन को तोड़ने का, जो हमें अपने ही मार्ग से भटकने को विवश करता है।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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