मिशन (बहुजन समाज पार्टी) के सच्चे कार्यकर्ता की पहचान एक सरल किंतु गहन सूत्र में निहित है—W = T₁ × T₂ × T₃। यह सूत्र तीन अनिवार्य तत्वों का गुणनफल दर्शाता है: समय (Time), प्रतिभा अथवा हुनर (Talent), तथा धन-साधन (Treasure)। बहुजन मिशन के योद्धा बनने हेतु इन तीनों का पूर्ण समन्वय अनिवार्य है। समय की प्रचुरता होनी चाहिए, जिससे विचारों के प्रचार-प्रसार, नेतृत्व के निर्देशों के क्रियान्वयन तथा जन-जागरण में निरंतर लगन बनी रहे। हुनर का होना भी आवश्यक है—वह कुशलता जो मिशन के सिद्धांतों को स्पष्टता से समझाने, कार्यों को प्रभावी ढंग से संपन्न करने तथा लोगों के हृदय तक संदेश पहुँचाने में सक्षम हो। साथ ही, आत्मनिर्भर साधन-संसाधन अर्थात् धन की उपलब्धता भी अपरिहार्य है, क्योंकि बिना आर्थिक सामर्थ्य के महान् उद्देश्यों की सिद्धि संभव नहीं।
यदि इनमें से कोई एक भी तत्व न्यून हो, तो कार्यकर्ता की पूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन असंभव हो जाता है। अनेक लोग ऐसे हैं जिनके पास समय की अधिकता है और हुनर भी प्रचुर, किंतु साधनों का अभाव उन्हें बाधित करता है। कुछ के पास प्रतिभा और आर्थिक समृद्धि दोनों विद्यमान हैं, परंतु समय की कमी उन्हें बंधन में जकड़ लेती है। कुछ के पास समय और संसाधन दोनों हैं, किंतु हुनर की कमी उन्हें प्रभावहीन बनाती है। इस प्रकार, इन तीनों में से एक का भी लोप कार्यकर्ता को अपूर्ण कर देता है।
हमारे मिशन में समय और प्रतिभा की प्रचुरता देखी जाती है, किंतु आत्मनिर्भर साधनों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी कमजोरी के कारण चुनावी मैदान में हमें प्रतिकूल परिणाम भुगतने पड़ते हैं। विपक्षी दल हजारों करोड़ों के कोष से लैस रहते हैं; उनके पास धन-कुबेरों की अकूत संपदा होती है, जिससे वे मीडिया को अधीन कर लेते हैं, मतदाताओं को लालच में फँसाते हैं, कार्यकर्ताओं को प्रलोभन देकर खरीद लेते हैं और यहाँ तक कि हमारे उम्मीदवारों को भी प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं।
इसी संदर्भ में मान्यवर साहब का अमर उद्गार स्मरणीय है—या तो इतने शक्तिशाली बन जाओ कि तुम भी उन्हें खरीद सको, अथवा ऐसा समाज गढ़ लो जो कभी न बिके। मान्यवर कांशीराम साहब, बहनजी तथा बसपा निरंतर बहुजन समाज को जातिवादी-विरोधी ताकतों से सावधान करती रही है, ताकि प्रलोभनों के जाल में फँसकर वह अपनी गरिमा और स्वाभिमान खो न बैठे। ‘ना बिकने वाला’ समाज का निर्माण ही हमारा परम लक्ष्य है।
अब समय आ गया है कि समस्त बहुजन समाज आत्ममंथन करे—क्या हमने विरोधियों के कुटिल षड्यंत्रों का शिकार हुए बिना, पूर्ण ईमानदारी से अपने मत का उपयोग अपने ही हित में किया है? यह प्रश्न केवल विचारणीय नहीं, अपितु क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार बन सकता है।

