एन दिलबाग सिंह का कॉलम: जातिय शोषण और क्रांति

संसार में जहाँ-जहाँ भी किसी का शोषण हुआ है वहाँ शोषितों द्वारा एक क्रांन्ति हुई है. लेकिन, भारत में सदियों बाद भी जातियों में शोषण खत्म नही हो पा रहा है. फिर यहाँ जातिवाद को खत्म करने के लिए व्यापक स्तर पर आजतक कोई क्रांति क्यो नही हो पाई?

जवाब पता करने की कोशिश कीजिये, जवाब आपके आसपास ही है लेकिन आप ध्यान ही नही दे रहे हो. आपका जातिय शोषण क्यों हो रहा है, इसका जवाब भी शोषित वर्गों की बजाय शोषण करने वाला ही सही से जानता हैं. क्योंकि, वो जानता है कि धर्म के नशे में डुबा शोषित समाज जब अपने महापुरुषों को जानने और उनके विचारों को अपनाने की बजाय उनको पूजने पर उतारू हो तो बदलाव कैसे आयेगा, क्रांति तो बहुत दूर की बात है. जिसने महापुरुषों के विचारों को जानने की कोशिश की, वो विचारों को कम समझ पाया, इसके उल्ट उनके विचारों को अपनी कुंठा और कट्टरता में लपेटने लगता है.

क्या आपको सही में लगता है जो समाज धर्म, संस्कृति या संस्कारों के चक्कर में पूरी तरह धर्म के ठेकेदारों के चंगुल में फसे रहना चाहते हैं, वो हिंदू धर्म की छत्रछाया में पली बड़ी सदियों पुरानी जातीय व्यवस्था का विरोध कर पायेंगे?

ये लोग बच्चा पैदा कर सकते हैं लेकिन आज भी खुद के अपने बच्चे का नाम रखने लायक खुद को नही मानते. ये लोग अपना घर बना सकते है. लेकिन, घर में प्रवेश करने के मूहुर्तों के चक्कर में आज भी वहीं अटके पड़े हैं. ये लोग आज भी अपने घरो में शादी की तारीख़ तक फाइनल करने के लायक खुद को नही मान पाये हैं. इन मानसिक रूप से अपंग हो चुके समाज से बहुत ज्यादा उम्मीद करना बेमानी है.

इनको आँखे बंद करके रोड़ पार करने से मत रोको, ये हर दुर्घटना को अपने नसीब में लिखा मानकर आपको ही दुनिया भर की कहानियाँ सुना डालेगें. इस समाज में 2-4% लोग हैं जो इनकी नसीब और बदनसीब वाली नैगेटिविटी को बाहर निकालने की कोशिश करते भी हैं तो वो भी टक्कर मारकर सिर फुड़वाने जैसी हालत में हैं. लेकिन,  नाउम्मीद नही हुए हैं क्योंकि बदलाव की गति भले ही कम हो पर लोगों की सोच में बदलाव तो आ रहे हैं.

जो लोग अपनी जिन्दगी के कोई फैसले स्वयं नही ले सकते. जिन लोगों को अच्छे बुरे का ज्ञान से मतलब ना हो. जिन लोगों को आज भी अपने महापुरूषों से ज्यादा देवी देवताओं की मनघड़ंत कहानियों पर विश्वास हो. जो लोग कुत्ते-बिल्ली, पेड-पोधों, विधवा-सधवा को अशुभ मानते हों. जो लोग शिक्षा से दूर भागते हों, मजदूरी को अपना नसीब मानते हों और जो लोग रोग-बीमारी को भी देवी देवता का प्रकोप मानते हों उनका क्या करें? जो लोग हजारों सालों से अपमानित होते आये हों और अभी भी इतना सारा पढ़ लिखकर अपने परिवारों को धर्म की गुलामी से आजाद कराने की सोच भी नही पाते हों, आड़म्बर भरे देवी-देवताओं के चंगुल से अभी भी अपने आपको नही निकालना चाहते हो, वे लोग क्या खाक क्रान्ति करेंगे?

लोकतंत्र में क्रांति का मतलब अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, वोट के अधिकार की कीमत समझना, राजनीति में अपना वर्चस्व दिखाना और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर माहौल देना होता है, यहाँ तो लोग धर्म के नशे पर अपनी कमाई को भी धर्म के लटोटरों में लुटाने पर आमदा हैं. इनको माता के जगराते, हरिद्वार नहाने, मंदिरों में खर्च करने या कावड़ लाने से आगे सोचना चाहिए या नही. ये भी एक अबूझ पहेली है. इनको ज्योतिबा फुले तो फूल (fool) लगते हैं, बाबासाहेब अम्बेड़कर तो पूजने के लिए मार्केट में नया भगवान दिखता है. इनकी आज भी मान्यवर कांशीराम के नाम में लिखे राम पर सुँई अटकी पड़ी है कि जैसे-तैसे इसको भी राम मानकर पुजना शुरू कर दें.

सुधार की गति कम होना भी सुधार होने की सही पहचान नही है. आप लोग अपनी समझ से, अपनी कलम से, अपने विवेक से सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्रांति कर सकने में पूरी तरह सक्षम हो लेकिन, तुम्हारी हालत उस ताकतवर हाथी की तरह है जिसको अपनी ताकत का अहसास नही है. अपने हक के सवालों पर मुँह खोलना नही सीखोगें तो अगली जनरेशन को दंड भुगतने के लिए तैयार रखिये. अब तक की जनरेशन का तो हम भविष्य लिख ही चुके हैं. इसमें जालौर भी मिलेगा, हाथरस भी मिलेगा, मिर्चपुर भी मिलेगा, बाथेपुर भी मिलेगा.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह, यह लेखक के निजी विचार हैं)

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